मैं इंसानों के बीच लगभग 40 साल गुज़ार चुका हूं और डेढ़ साल ब्लागर्स के साथ भी कबड्डी से लेकर खो खो और शतरंज तक कई तरह के गेम खेल चुका हूं। इस लंबे अर्से के तजर्बे के बाद मैं कह सकता हूं कि आदमी शांति चाहता है लेकिन उसे मज़ा हंगामों में आता है। ब्लॉग जगत में फैले भ्रष्टाचार और पक्षपात को जड़ से उखाड़ फेंकने की मुहिम में मुझे जिन लोगों की ग़लती को चिन्हित करना पड़ा उनमें से एक मशहूर वकील साहब भी हैं। इसी क्रम में दो पोस्ट में महापत्रकार अजय कुमार झा जी का नाम मजबूरन लेना पड़ा। उन्होंने हमें सलाह दी कि
‘वक्त को समझिए डॉण् साहब ए उर्जा को अगर सही दिशा मिले तो ही वो सृजन करती है।‘
उनकी बात बिल्कुल सही थी, सो हमने फ़ौरन उस पर अमल किया और एक सकारात्मक संदेश देने वाली पोस्ट तैयार करके हिंदी ब्लॉग जगत के सुपुर्द कर दी।
अब सुनिए कि हमारी तीनों पोस्ट के साथ हुआ क्या ?
पहली दोनों पोस्ट्स में से तो एक को 27 पाठकों ने देखा और उस पर 8 कमेंट हुए। दूसरी पोस्ट को 35 लोगों ने देखा और उस पर 7 कमेंट हुए।
तीसरी सकारात्मक और सृजनात्मक पोस्ट को कुल 7 पाठकों ने पढ़ा और उस पर कमेंट शून्य है। अजय कुमार झा जी भी उस पर कमेंट देने नहीं आए, जिन्होंने मुझे ऐसा करने की सलाह दी थी। ईमानदारी का दंभ भरने वाले कुछ गुटबंद ब्लॉगर्स, जो कि आए दिन ऐसी ही सलाहें देते घूमते हैं, उनमें से भी कोई इस पोस्ट पर ‘नाइस पोस्ट‘ लिखने नहीं आया।
यह कैसी दुनिया है कि किसी की टांग खींचो तो तुरंत 50 आदमी आ जाएंगे और कमेंट भी देंगे और सलाह भी देंगे कि आप ऐसा करें और आप वैसा करें और जब आप उनकी सलाह के मुताबिक़ सकारात्मक लेखन करेंगे तो फिर न आपको उनमें से कोई पढ़ने आएगा और न ही आपको कमेंट देने के लिए।
आज यह विषय एक गंभीर चिंतन और आत्ममंथन मांगता है, जिसे हिंदी और मानवता के हित में ईमानदारी से और जल्दी से जल्दी किया जाना ज़रूरी है।
1- दो ब्लॉग पर एक ही पोस्ट , अजय जी के साहस को हमारा सलाम मय 11 तोप के गोलों के साथ इसलिए कि शायद सोने वाले जाग जाएं भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ Corruption
2- अजय कुमार झा जी ने सचमुच ही चार चांद लगा दिए हमारी वाणी को - Anwer Jamal
3- बोलने से पहले खूब सोच लेने से आदमी बहुत सी बुराईयों से बच जाता है The Word
‘वक्त को समझिए डॉण् साहब ए उर्जा को अगर सही दिशा मिले तो ही वो सृजन करती है।‘
उनकी बात बिल्कुल सही थी, सो हमने फ़ौरन उस पर अमल किया और एक सकारात्मक संदेश देने वाली पोस्ट तैयार करके हिंदी ब्लॉग जगत के सुपुर्द कर दी।
अब सुनिए कि हमारी तीनों पोस्ट के साथ हुआ क्या ?
पहली दोनों पोस्ट्स में से तो एक को 27 पाठकों ने देखा और उस पर 8 कमेंट हुए। दूसरी पोस्ट को 35 लोगों ने देखा और उस पर 7 कमेंट हुए।
तीसरी सकारात्मक और सृजनात्मक पोस्ट को कुल 7 पाठकों ने पढ़ा और उस पर कमेंट शून्य है। अजय कुमार झा जी भी उस पर कमेंट देने नहीं आए, जिन्होंने मुझे ऐसा करने की सलाह दी थी। ईमानदारी का दंभ भरने वाले कुछ गुटबंद ब्लॉगर्स, जो कि आए दिन ऐसी ही सलाहें देते घूमते हैं, उनमें से भी कोई इस पोस्ट पर ‘नाइस पोस्ट‘ लिखने नहीं आया।
यह कैसी दुनिया है कि किसी की टांग खींचो तो तुरंत 50 आदमी आ जाएंगे और कमेंट भी देंगे और सलाह भी देंगे कि आप ऐसा करें और आप वैसा करें और जब आप उनकी सलाह के मुताबिक़ सकारात्मक लेखन करेंगे तो फिर न आपको उनमें से कोई पढ़ने आएगा और न ही आपको कमेंट देने के लिए।
सारी हालत आपके सामने है क्योंकि मेरी तीनों पोस्ट आप हमारी वाणी के बोर्ड पर देख सकते हैं। यह बात सकारात्मक लेखन के लिए ब्लॉगर्स का हौसला पस्त करने के लिए काफ़ी है।
क्या यह सही हो रहा है ?आज यह विषय एक गंभीर चिंतन और आत्ममंथन मांगता है, जिसे हिंदी और मानवता के हित में ईमानदारी से और जल्दी से जल्दी किया जाना ज़रूरी है।
2- अजय कुमार झा जी ने सचमुच ही चार चांद लगा दिए हमारी वाणी को - Anwer Jamal
3- बोलने से पहले खूब सोच लेने से आदमी बहुत सी बुराईयों से बच जाता है The Word
