Friday, April 8, 2011

कैसे होता है सकारात्मक लेखन के लिए ब्लॉगर्स का हौसला पस्त ? An Alarming Call

मैं इंसानों के बीच लगभग 40 साल गुज़ार चुका हूं और डेढ़ साल ब्लागर्स के साथ भी कबड्डी से लेकर खो खो और शतरंज तक कई तरह के गेम खेल चुका हूं। इस लंबे अर्से के तजर्बे के बाद मैं कह सकता हूं कि आदमी शांति चाहता है लेकिन उसे मज़ा हंगामों में आता है। ब्लॉग जगत में फैले भ्रष्टाचार और पक्षपात को जड़ से उखाड़ फेंकने की मुहिम में मुझे जिन लोगों की ग़लती को चिन्हित करना पड़ा उनमें से एक मशहूर वकील साहब भी हैं। इसी क्रम में दो पोस्ट में महापत्रकार अजय कुमार झा जी का नाम मजबूरन लेना पड़ा। उन्होंने हमें सलाह दी कि
‘वक्त को समझिए डॉण् साहब ए उर्जा को अगर सही दिशा मिले तो ही वो सृजन करती है।‘
उनकी बात बिल्कुल सही थी, सो हमने फ़ौरन उस पर अमल किया और एक सकारात्मक संदेश देने वाली पोस्ट तैयार करके हिंदी ब्लॉग जगत के सुपुर्द कर दी।
अब सुनिए कि हमारी तीनों पोस्ट के साथ हुआ क्या ?
पहली दोनों पोस्ट्स में से तो एक को 27 पाठकों ने देखा और उस पर 8 कमेंट हुए। दूसरी पोस्ट को 35 लोगों ने देखा और उस पर 7 कमेंट हुए।
तीसरी सकारात्मक और सृजनात्मक पोस्ट को कुल 7 पाठकों ने पढ़ा और उस पर कमेंट शून्य है। अजय कुमार झा जी भी उस पर कमेंट देने नहीं आए, जिन्होंने मुझे ऐसा करने की सलाह दी थी। ईमानदारी का दंभ भरने वाले कुछ गुटबंद ब्लॉगर्स, जो कि आए दिन ऐसी ही सलाहें देते घूमते हैं, उनमें से भी कोई इस पोस्ट पर ‘नाइस पोस्ट‘ लिखने नहीं आया।
यह कैसी दुनिया है कि किसी की टांग खींचो तो तुरंत 50 आदमी आ जाएंगे और कमेंट भी देंगे और सलाह भी देंगे कि आप ऐसा करें और आप वैसा करें और जब आप उनकी सलाह के मुताबिक़ सकारात्मक लेखन करेंगे तो फिर न आपको उनमें से कोई पढ़ने आएगा और न ही आपको कमेंट देने के लिए।
सारी हालत आपके सामने है क्योंकि मेरी तीनों पोस्ट आप हमारी वाणी के बोर्ड पर देख सकते हैं। यह बात सकारात्मक लेखन के लिए ब्लॉगर्स का हौसला पस्त करने के लिए काफ़ी है। 
क्या यह सही हो रहा है ?
आज यह विषय एक गंभीर चिंतन और आत्ममंथन मांगता है, जिसे हिंदी और मानवता के हित में ईमानदारी से और जल्दी से जल्दी किया जाना ज़रूरी है।

1- दो ब्लॉग पर एक ही पोस्ट , अजय जी के साहस को हमारा सलाम मय 11 तोप के गोलों के साथ इसलिए कि शायद सोने वाले जाग जाएं भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ Corruption
2- अजय कुमार झा जी ने सचमुच ही चार चांद लगा दिए हमारी वाणी को - Anwer Jamal
3- बोलने से पहले खूब सोच लेने से आदमी बहुत सी बुराईयों से बच जाता है The Word

7 comments:

सलीम ख़ान said...

great

अजय कुमार झा said...

पहली दोनों पोस्ट्स में से तो एक को 27 पाठकों ने देखा और उस पर 8 कमेंट हुए। दूसरी पोस्ट को 35 लोगों ने देखा और उस पर 7 कमेंट हुए।
तीसरी सकारात्मक और सृजनात्मक पोस्ट को कुल 7 पाठकों ने पढ़ा और उस पर कमेंट शून्य है। अजय कुमार झा जी भी उस पर कमेंट देने नहीं आए, जिन्होंने मुझे ऐसा करने की सलाह दी थी। ईमानदारी का दंभ भरने वाले कुछ गुटबंद ब्लॉगर्स, जो कि आए दिन ऐसी ही सलाहें देते घूमते हैं, उनमें से भी कोई इस पोस्ट पर ‘नाइस पोस्ट‘ लिखने नहीं आया।

अमां डॉ . साहब काहे हमसे नाहक ही वो सब लिखाए जा रहे हैं जो अभी हम लिखना नहीं चाह रहे हैं , अभी क्या बल्कि कभी लखना नहीं चाह रहे हैं ..देश भ्रष्टाचारियों की उलटी गिनती गिन रहा है और आप हैं कि टिप्पियां गिनाने पर लगे हैं ..अरे हमारा नाम घुसेडने से का होगा सर जी । पहिले ही कह रहे हैं कि ..अभी अन्ना की आग हर सीने में जल रही है ....आप अपना चूल्हा थोडे दिनों के लिए भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही गर्म रखें ..ई सब काम के लिए तो न हम भागे जा रहे हैं न आप ..। मुदा आप हैं कि दंड पेल रहे हैं ..आप नाईस की चिंता काहे करते हैं महाराज ...सलीम भाई ग्रेट बोलिए गए हैं ....हम ग्रेटेस्ट कहे देते हैं आपकी पोस्ट को । देखिए अब आप अगली पोस्ट में फ़िर से कहिएगा कि महापत्रकार ( एक तो ई आपका नयका टाईप का designation गज्ज्ब्बे है महाराज ) अजय भाई ने फ़िर से ई लिख दिया ऊ लिख दिया । अरे बाद में करेंगे न ई बात सब ..फ़िलहाल तो जनलोकपाल विधेयक पर अवाम का साथ दीजीए ....कहिए कुछ गलत कहा हो तो । चलिए खुदा हाफ़िज़ ..खुदा आपकी नेक नीयती बरकरार रखे । शुभकामनाएं आपको ..

DR. ANWER JAMAL said...

भाई अजय जी ! आप जो भी सलाह देते हैं , हम उसे मानते ज़रूर हैं. अब हम भी अन्ना जी और भ्रष्टाचार पर लिखेंगे.
इस विषय पर मुझे यह लेख पसंद है.

समस्या नहीं समाधान बनिए
अन्ना हजारे के पहले हमारे मीडिया के पास विश्व कप का मसला था। उसके पहले टू-जी, सीडब्लूजी से लेकर शीला की जवानी तक तमाम मसले थे। मीडिया के पास मसले और मसाले में कोई फर्क नहीं है। यह कारोबार भी दुतरफा है। जनता चाहे तो मीडिया की अराजकता पर रोक लग सकती है। और मीडिया चाहे तो जनता की विचारशीलता बेहतर हो सकती है। जल्द ही आईपीएल शुरू होने वाला है। शायद जल्द हम अन्ना को भूल जाएं। हमारे भीतर जोशो-जुनून है, उत्साह है, बेचैनी है, पर ठंडे दिमाग से सोचने विचारने का मौका नहीं है। बेहतर हो कि हम इस दिशा में कुछ सोचें।

अजय कुमार झा said...

आपके द्वारा सुझाए गए लिंक पर पहुंच कर बहुत खुशी हुई । अनवर साहब । आपका बहुत बहुत शुक्रिया इस पोस्ट तक पहुंचाने के लिए

सञ्जय झा said...

bhai jamal saheb.........

aap badshaon ke badshah khan hain...
blogjagat ke ambbani hain.....25 manjil(blog)ki antila apke pass hai..
kitne pathkon ko apne lekhak bana
diya......choti-choti baton me aap
apni rachnatmakta jaya na karen....

aur tippani se kya....ye to networking ka khel hai.......aap dekhen.....ke jo wakai achhe blog
hain 2/5/7 se jada tippani nahi hoti.........oh balak hokar bujurg
(gyan me) kyon bake ja raha hoon...
muaf karenge.....

salam...

DR. ANWER JAMAL said...

संजय झा जी ! बच्चा साफ़ दिल का मालिक होता है और आजकल के बच्चों की आई. क्यू. भी अपेक्षाकृत ज़्यादा है। बच्चे बड़ों को सही बात बता सकते हैं। मैं आपकी बात मानूंगा। आपकी बातें सही हैं। आपका आकलन ठीक है और सबसे बढ़कर आपके दिल की वह मुहब्बत है जिसे मैं जानता हूं।
आपका शुक्रिया कि आपने मेरी रहनुमाई की।
कृपया आप मेरी यह पोस्ट पढ़ें

तौहीद और शिर्क लेखक - मौलाना क़ारी तय्यब साहब Maulana Qari Tayyab Sahab

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सकारात्मक लिखते रहना चाहिए कमेंट जैसे नकारात्कम विचारों से परे।