Thursday, September 15, 2011

क्या खाने की प्लेट चिकेन के बिना अधूरी होती है ?

हमने एक रिपोर्ट पढ़ी तो यह सवाल हमारे सामने आ खड़ा हुआ .
आप भी देखें वह रिपोर्ट - 

खाने की प्लेट चिकेन के बिना अधूरी होती है

खाने की प्लेट चिकेन के बिना अधूरी होती है। यह बात सुनकर कोई शाकाहारी व्यक्ति भले ही मुंह बिचकाए, पर चिकेन के शौकीन  इसका पुरजोर समर्थन करेंगे।बदलते समय में जब खान-पान की आदतें बदल रही हैं और बाजार में तमाम तरह के व्यंजन उपलब्ध हैं, ऐसे समय में चिकेन से बने व्यंजन लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। 
शेफ सुहैल हसन कहते हैं आज चिकेन से बने कई तरह के व्यंजन उपलब्ध हैं। चिकेन पारंपरिक इंडियन करी से लेकर चाइनीज, इटालियन हर तरह के खाने में मिल जाएगा।भारतीय खाने में चिकेन बिरियानी, चिकेन करी, तंदूरी चिकेन जैसे व्यंजन मिल जाएंगे। अफगानी खाने में शोरमा, अफगानी तंदूर और कबाब जैसे लजीज पकवान मिल जाएंगे। इटालियन खाने में चिकेन पिज्जा और चिकेन पास्ता मिल जाएगा, वहीं चाइनीज खाने में चिकेन चाउमीन, चिकेन सूप, चिकेन चॉप्सी, चिली चिकेन, चिकेन मोमो और चिकेन मंचूरियन जैसे स्वादिष्ट और लोकप्रिय व्यंजन मिल जाएंगे। उनके अनुसार, फास्ट फूड के शौकीनों को भी चिकेन बर्गर, चिकेन पैटीस और चिकेन रोल जैसे ढेरों व्यंजन मिल जाते हैं। एक चिकेन से आज हजारों तरह के व्यंजन बनने लगे हैं।चिकेन के एक दीवाने परमानंद मिश्र का कहना है कि खाने में रोज ही चिकेन व्यंजन हो तो क्या बात है। लेकिन जरूरत इस बात की है कि वह अलग-अलग वेराइटी में हो। उनकी पत्नी सौम्या मिश्र ने बताया कि घर हो या बाजार, ननवेजेटेरियन्स की पहली पसंद चिकेन व्यंजन ही होते हैं। साथ ही उन्होंने जोड़ा कि घर आने वाले मेहमान अगर शाकाहारी हों तो बड़ी कोफ्त होती है। समझ में नहीं आता है कि क्या बनाएं और क्या खिलाएं। चिकेन के अन्य आशिक प्रसेनजित राज्यवर्द्धन ने कहा कि रोज के खान-पान का हिस्सा बन चुके चिकेन संस्कृति को बढ़ावा देने में रेस्त्राओं का भी खासा योगदान रहा है। उनकी पत्नी दिव्या ने बताया कि घर से बाहर उनकी पहली पसंद चिकेन से बने व्यंजन ही होते हैं।रेसिपी विशेषज्ञ ममता सिंह कहती हैं चिकेन कलचर आज इस कदर फैला हुआ है कि कुछ लोगों को इसके बिना भोजन अधूरा लगता है। कभी केवल घरों में पकने वाला चिकेन आज रेस्त्रां, कैफे के अलावा गली-मुहल्ले में स्थित रोल, मोमो और चाउमीन के फास्ट फूड के ठेले पर भी मिलने लगा है। वैसे पुरानी दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके के मशहूर करीम रेस्त्रां, न्यू फ्रेंडस कॉलोनी के अल बेक रेस्त्रां में दिन भर खाने के लिए लोगों की भीड़ जमा रहती है।

मैक्डोनाल्ड्स का मशहूर चिकेन बर्गर यहां आने वाले खाने के शौकीनों के सबसे पसंदीदा खाने में से एक है। वहीं केएफसी [केंटचुकी फ्राइड चिकेन] रेस्त्रां तो चिकेन प्रेमियों के लिए खास ही है। यहां चिकेन विंग्स, चिकेन बर्गर और चिकेन लेग्स जैसे चिकेन के ढेरों आइटम मिलते हैं। कनॉट प्लेस स्थित केएफसी आउटलेट मे काम करने वाले अतुल सिंह ने कहा कि इसका स्वाद एक बार चढ़ जाए तो छूटना मुश्किल होता है।
चिकेन न केवल अपने देश में, बल्कि बाहर के देशों मे भी काफी लोकप्रिय है। अमेरिका में चिकेन इस कदर लोकप्रिय है कि वहां सितंबर महीना नेशनल चिकेन मंथ के रूप में मनाया जाता है। 15 सितंबर को वहां नेशनल चिकेन लवर्स डे के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन अमेरिका के कई रेस्त्राओं में मुफ्त चिकेन परोसा जाता है। इन्हीं में से एक पोलो ट्रॉपिकल रेस्त्रां चेन में आज के दिन हर साल दोपहर दो बजे से शाम के सात बजे तक पीले कपड़ों में आने वाले लोगों को मुफ्त में चिकेन परोसा जाता है। यानि जी भर के चिकेन खाइए वो भी बिल्कुल मुफ्त और मनाइए चिकेन लवर्स डे।
Source : http://aryabhojan.blogspot.com/2011/09/blog-post_15.html

Monday, September 12, 2011

क्या पश्चिमी नग्नता में ही नारी उत्थान छिपा है ? - प्रवीण शुक्ल



बात शुरू करते है नारी शास्क्तिकरण और नारी उत्थान की (जिसकी हवा बाँध कर कुछ चंद प्रगतिवादी अपनी पद प्रतिस्ठा और अर्थ की रोटियां सेक रहे है और समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को दिग्भर्मित किये है ),,,, आखिर नारी वादी आन्दोलन है क्या? मै तो आज तक नहीं समझ पाया .,,,, क्या नारी वादी आन्दोलन वास्तव में स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए की जा रही कोई क्रान्ति है ?,, या फिर पश्चिम से लिया गया एक खोखला दर्शन ,, जिससे स्त्री उत्थान तो संभव नहीं हां अवनति के द्वार अवस्य खुलते है ,,, अगर पश्चिम के इस दर्शन से कुछ हो सकता तो पश्चिमी समाज में स्त्रियो की जो दशा आज है शायद वो नहीं होती ,,,,,
हत्या ----दिसम्बर २००५ की रिपोर्ट के आधार अनुसार अकेले अमेरिका में ११८१ एकल औरतो की हत्या हुई जिसका औसत लगभग तीन औरते प्रति दिन का पड़ता है यहाँ गौर करने वाली बात ये है की ये हत्याए पति या रिश्ते दार के द्बारा नहीं की गयी बल्कि ये हत्याए महिलाओं के अन्तरंग साथियो (भारतीय प्रगतिवादी महिलाओं के अनुसार अन्तरंग सम्बन्ध बनाना महिलायों की आत्म निर्भरता और स्स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल है और इसके लिए उन्हें स्वेच्छा होनी चाहिए) के द्बारा की गयी ,,,,
अब अंत रंग साथियो ने येसा क्यूँ किया कारण आप सोचे ,,,,नहीं नहीं नहीं नंगा पन (कथित प्रगतिवाद ) इसके लिए जिम्मेदार नहीं है ,,,
घरेलू हिंसा-----National Center for Injury Prevention and Control, के अनुसार अमेरिका में ४.८ मिलियन औरते प्रति वर्ष घेरलू हिंसा और अनेच्छिक सम्भोग का शिकार होती है ,,, और इनमे से कम से कम २० % हो अस्पताल जाना पड़ता है ...
कारण ---- पुरुष विरोधी मानसिकता और पारिवारिक व्यवस्थाओं में अविस्वाश और निज का अहम् (जो की कथित प्रगतिवाद की श्रेणी में आता है ) तो कतई नहीं होना चाहिए ,,,
सम्भोगिक हिंसा -----National Crime Victimization Survey, के अनुसार 232,960 औरते अकेले अमेरिका में २००६ के अन्दर बलात्कार या सम्भोगिक हिसा का शिकार हुई , अगर दैनिक स्तर देखा जाए तो ६०० औरते प्रति दिन आता है,,,इसमें छेड़छाड़ और गाली देने जैसे कृत्य को सम्मिलित नहीं किया गया है ,,, वे आकडे इसमें सम्मिलित नहीं है जो प्रताडित औरतो की निजी सोच ( क्यूँ की कुछ औरते येसा सोचती है की मामला इतना गंभीर नहीं है या अपराधी का कुछ नहीं हो सकता)और पुलिस नकारापन और सबूतों अनुपलब्धता के के कारण दर्ज नहीं हो सके ,,,
कारण --- इन निकम्मे प्रगतिवादियों और नारी वादियों द्बारा खड़े किये गए पुरुष विरोधी बबंडर रूपी भूत की परिणिति से उत्पन्न स्त्री पुरुष बिरोध और वैमन्यस्यता ( स्त्रियों को पुरुषों के खिलाफ खूब भरा जाना और और पुरुषों का स्त्र्यो की सत्ता के प्रति एक भय का अनुभव )तो बिलकुल नहीं ये आकडे बहुत है मै कम दे रहा हूँ और उद्देश्य बस इतना ही है की पुरुष विरोध के कथित पूर्वाग्रह को छोडिये ( जिसे मै पश्चिम की दें मानता हूँ )
इसमें किसी तरह का कोई नारी विरोध नहीं है और ना ही मै ये चाह्ता हूँ की उनकी स्तिथि में सुधार ना हो ,, बल्कि मै तो आम उन स्त्रियों को समझाना चाहता हूँ (जो इन कथित प्रगतिवादी महिलाओं और पुरुषों के द्बारा उनके निजी लाभ के कारण उकसाई जा रही है) की इनके प्रगतिवाद में कोई दम नहीं अगर वास्तव में आप को समाज में अपनी स्तिथि को उच्चता पर स्थापित करना है तो आप को उस भारतीय परम्परा की ओर बापस आना होगा ( जो कहता है स्त्रिया पुरुषों से अधिक उच्च है ) है ,,,
अब कथित प्रगतिवादियों के लिए छोटा सन्देश आप को अपनी प्रस्थ भूमि पर फिर विचार करने की आवश्यकता है और देखना है की जिस प्रगतिवाद की दुहाई आप दे रही है और जिन्हें आप ने मानक के रूप में स्थापित कर रक्खा है ,, क्या प्रगति वाद से उनकी वास्तव में कोई भी प्रगति हुई इतने लम्बे चले पश्चमी प्रगतिवादी आन्दोलन से क्या हासिल हुआ केवल विच्च का नाम जिस पर पश्चिमी औरते गर्व करती है ,,
’m tough, I’m ambitious, and I know exactly what I want. If that makes me a bitch, okay. - Madonna Ciccone

Source : http://www.thenetpress.com/2009/10/blog-post_09.html

Sunday, August 14, 2011

क्या हम इन हालात में मनाएंगे जश्न ए आज़ादी ?


पुण्य प्रसून बाजपेयी


हो सकता है यह संयोग हो, लेकिन 5 अगस्त को जब कॉमनवेल्थ गेम्स की पोटली कैग ने खोली और पीएमओ का नाम लिया तो एक पत्रकार ने सवाल पूछा, आप मनमोहन सिंह का नाम क्यों नहीं लेते हो? तो उक्त  अधिकारी ने कहा? नाम आप लीजिये हम तो संस्था बताते हैं। कुछ इसी तरह का सवाल 19 बरस पहले 1992 में सिक्योरिटी स्कैम यानी हर्षद मेहता घोटाले के वक्त जब पीएमओ का नाम आया तो एक पत्रकार ने पूछा आप पीवी नरसिंह राव क्यों नहीं कहते हैं, तो जवाब मिला नाम आप बताईये। लेकिन, उस वक्त जो नाम अखबारों की सुर्खियों में आया वह तब के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह और वाणिज्य राज्य मंत्री पी. चिदबरंम का था। और संयोग देखिये 19 बरस बाद कॉमनवेल्थ से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले तक में जो नाम सुर्खियो में है उसमें मनमोहन सिंह और चिदबरंम का ही नाम है। और स्वास्‍थ्‍य मंत्री बी.शंकरानंद का भी नाम था. 19 बरस पहले चिदबरंम को इस्‍तीफा देना पड़ा था। लेकिन, हर्षद मेहता के काले दामन का असल दाग तब भी वित्त मंत्रालय पर ही लगा था। सिर्फ मनमोहन सिंह नही बल्कि उनके जूनियर रामेश्वर ठाकुर भी फंसे थे।

लेकिन, इन 19 बरस में क्या-क्या कुछ कैसे-कैसे बदल गया, अगर उसके आईने में तब के वित्त मंत्री और अब के प्रधानमंत्री को फिट कर दिया जाये सिक्के के दोनों तरफ एक ही तस्वीर नजर आयेगी और संयोग शब्द कमजोर भी लगने लगता है। क्योंकि अभी जिस तरह टेलीकॉम, पेट्रोलियम, फूड, फर्टिलाईजर, कोयला और वित्त मंत्रालय से लेकर पीएमओ तक अलग-अलग घोटालों में फंसे दिखायी पड़ रहे हैं। अगर इसके उलट पीवी नरसिह राव के दौर यानी 1991-96 के वक्त मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधार के आईने में घोटाले और उसकी कहानियों को देखें तो अभी के वक्त पर सवाल खड़ा हो सकता है। अभी के कैश-फोर-वोट के उलट जेएमएम घूसकांड का सच जब कई हिस्‍सों में सामने आया तो पता यही चला कि सांसदों को खरीदा गया।

और उस वक्त रुपया जुगाड़ा पेट्रोलियम मंत्री सतीश शर्मा ने। हुआ यह कि सतीश शर्मा ने तब पेट्रोलियम सचिव खोसला को पेट्रोलियम डेवलेपमेंट प्रोजेक्ट के नाम पर कुछ खास कंपनियों को तेल के कुएं देने को कहा। खोसला ने निर्णय लिया तो ओएनजीसी के वरिष्ट अधिकारियो ने इसका विरोध किया। मंत्री सतीश शर्मा इस लड़ाई में कूदे और तेल के कुएं एस्सार, वीडियोकॉन और रिलांयस को बांटे गये। एक महीने बाद ही पेट्रोलियम सचिव खोसला ने पद से इस्‍तीफा दे रिलायंस का दामन थाम लिया। खोसला को एस्सार ने 7 करोड़, रिलांयस ने 4 करोड़ और वीडियोकॉन ने 2 करोड़ दिये। जिसमें से साढ़े तीन करोड़ तो जेएमएम कांड में बांटे गये बाकी डकार लिये गये।

जाहिर है इस आईने में कुछ दिन पहले तक रहे पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा के रिलायंस प्रेम में गैस बेसिन बांटना भी देखा जा सकता है और पेट्रोल की कीमत किस तरह निजी कंपनियों के हवाले कर दी गयी यह भी समझा जा सकता है। 2जी स्पेक्ट्रम लाईसेंस को लेकर चाहे अब यह सवाल खड़ा होता हो कि सूचना तकनीक तो अभी ही दिखायी दे रही है तो फिर एनडीए के दौर की नीति पर चलने का मतलब क्या है। लेकिन सच यह भी है कि देश की आजादी के बाद 44 बरस में जितने टेलीफोन इस देश में थे उससे ज्यादा टेलीफोन 1991-95 के दौर में लगे। 1991 तक सिर्फ 50 लाख फोन थे। लेकिन 1995 में इसका संख्य एक करोड पांच लाख हो गई। और टेलीकॉम का असल घोटाला भी इसी वक्त हुआ। जब सुखराम के घर में बोरियो में साढ़े तीन करोड़ जब्त भी हुये और 5 बरस में 1000 करोड़ के काम में से सिर्फ 5 फीसदी काम ही पूरा हुआ। और डीओटी के अधिकारियों ने भी देश को चूना लगाया क्योंकि हर साल 4 हजार करोड़ के कल-पुर्जे इस दौर में पांच साल तक खरीद में दिखाये गये। लेकिन जैसे अभी 2जी लाईसेंस के खेल के पीछे कारपोरेट का मुनाफा पाने के लिये ए. राजा को मंत्री बनाने तक का खेल रहा।

उसी तर्ज पर उस दौर में भी डेढ़ लाख करोड़ में से 85 हजार करोड़ का काम बिना बिड के सुखराम ने अपने मातहत कंपनी हिमाचल फुटुस्टिक कम्युनिकेंसन लि. यानी एचपीसीएल को दे दी। जिसके संबंध इजरायल के कंपनी बेजेक्यू टेलीकॉम से जुड़े थे । उस वक्त रिलायंस यह सौदा चाहता था। लेकिन उसके हाथ खाली रहे, तो उसने अपने करीबी सासंदो को जरिये दस दिनो तक संसद ठप करवा दी। और कारपोरेट तंत्र ने सरकार को भी टेलीकॉम घोटाले को पकड़ने के लिये मजबूर किया। यह अलग बात है 2011 में इसी रिलांयस के बडे अधिकारी भी तिहाड़ जेल में स्पेक्ट्रम घोटाले की वजह से बंद हैं। महंगाई में कृषि मंत्री शरद पवार की चीनी माफिया को मदद पहुंचाने के आरोप बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस भी लगाती रही है।

लेकिन 19 बरस पहले चीनी का खेल कल्पनाथ राय ने किया था। 650 करोड़ के चीनी घोटाले के बाद कल्पनाथ राय को हवालात भी जाना पडा था और उसके बाद अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद के साथ संबंधों के मद्देनजर आतंकवादी कानून टाडा भी लगा था। डेढ़ बरस पहले मनमोहन सिंह के ही मंत्रीमंडल में फर्टीलाईजर मंत्री भी यूरिया घोटाले में फंसे। लेकिन यूरिया का असल घोटाला तो पीवी नरिसंह राव के दौर में हुआ। जब उनके बेटे प्रभाकर राव और रामलखन सिंह यादव के बेटे फर्टीलाईजर मंत्री प्रकाश चन्द्र यादव ने 133 करोड का यूरिया टर्की की कंपनी कर्सन से मंगाया। और नेशनल फर्टीलाईजर लिंमेटेड के दस्तावेजों में 133 करोड का यूरिया ले भी लिया. लेकिन वह यूरिया कभी आया ही नहीं। और मामला पीएम के बेटे से जुड़ा था तो तत्कालिक वित्त मंत्री मनमोहन सिंह की खामोशी में मामले को ही रफा-दफा किया गया। तीन महीने पहले दिल्ली के कनाट-प्लेस की एक कंपनी से 70 करोड़ रुपये कैश पकड़ाये तो सीबीआई और सीबीडीटी के अधिकारियों ने कहा कि यह हवाला और मनीलॉडरिंग का रुपया है।

और देश की छोटी बडी सौ से ज्यादा कंपनियों के तार इससे जुड़े हुये हैं। इसमें राजनेताओं और नौकरशाहों के भी नाम आने की बात कही गयी। लेकिन बीते तीन महीने में हर कोई इस हवाला रैकेट को भूल गया। लेकिन 1995 का हवाला रैकेट आज भी देश को याद है। उस वक्त मध्यप्रदेश के व्यवसायी एस. के. जैन के हवाला खेल में देश के 31 टॉप राजनेता और 16 बडे नौकरशाहों का नाम आया था। राव कैबिनेट के 15 मंत्रियों के नाम थे। और सीबीआई को मिले जैन के घर से छापे में 58 लाख रुपये नकद। दो लाख की विदेशी करेंसी। 15 लाख के इंदिरा विकास पत्र। दो डायरियां और नोटबुक। याद कीजिये उस वक्त जैन डायरी में किस-किस का नाम लिखा था जिसे लेकर देश भर में हंगामा मचा। राजीव गांधी भी थे और आडवाणी भी। प्रणव मुखर्जी भी थे और यशंवत सिन्हा भी। आर. के. धवन भी थे और अरुण नेहरु भी। कमलनाथ भी थे और विजय कुमार मल्‍होत्रा भी। कैबिनेट सचिव नरेश चन्द्र भी थे और एनटीपीसी चैयरमैन पीएस बामी भी। जैन से पूछताछ में घेरे में पीएमओ भी आया और वित्त मंत्री पर भी अंगुली उठी।

उस दौर में भी यह माना गया कि पीवी नरसिंह राव ने संसद की जसंवत सिंह की अध्यक्षता वाली प्रावकलन कमेटी की सिपारिशो को ठंडे बस्ते में रखकर सीबीआई को संवैधानिक दर्जा नहीं दिया जा रहा था। क्योंकि 4 मार्च से 12 मार्च 1995 में जैन ने जो सीबीआई के सामने कबूला उससे नरसिंह राव ही हवाला शिंकजे में फंस रहे थे। जैन का वह बयान आज भी अपराध दंड संहिता की धारा 161 के तहत दर्ज है। जाहिर है इस आईने में स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच में पूर्व कैबिनेट मंत्री ए. राजा के बयान झलक सकते हैं। लेकिन देखिये उस वक्त हवाला की कुल रकम 69 करोड थी। और बीते तीन बरस में हवाला के तहत देश में 7 अरब से ज्यादा रुपया जब्त किया जा चुका है। लेकिन देश में कोई हरकत नहीं है।

घोटाले की फेरहिस्त की अब तो खनन की जमीन को निजी कंपनियो को बांटना और बेल्लारी सरीखी लूट सियासी जरुरत और विकास का मंत्र बन चुकी है। लेकिन यह खेल 1995 में भी खेला गया। तब कोयला मंत्री संतोष मोहन देव ने 240 करोड की बैलेडिला कोयला खादान महज 16 करोड में निजी कंपनी निप्पन डेन्ड्रो को दे दी थी। चूंकि निप्पन से पीएम की करीबी थी तो वित्त मंत्री ने भी उस वक्त कोई अंगुली नहीं उठायी। कुछ इसी का खेल शहरी विकास मंत्री शीला कौल ने दो हजार सरकारी घरों को बांट कर किया। दरअसल राव के दौर में जिस आर्थिक सुधार की लकीर मनमोहन सिंह बतौर वित्त मंत्री देश में खींच रहे थे और अब बतौर प्रधानमंत्री उसी लकीर पर देश को दौड़ा रहे हैं असल में उसका असर भी उसी अनुरुप दिखायी देने लगा है। इसलिये 1996 में आर्थिक घोटालो के लिये सीबीआई के फंदे में 200 कंपनियों के नाम थे। और आज 1100 कंपनियो के नाम हैं।

उस दौर में आईटीसी ने 350 करोड़ का फेरा उल्लघन किया था। गोल्डन टबैको के संजय डालमिया 400 करोड़ के खेल में फंसे थे। शा वैलेस के एमआर छाबरिया 100 करोड़ के इक्मानिक अफेन्स में तो गणपति एक्सपोर्ट के ओपी अग्रवाल 90 करोड़ की मनी लॉन्‍डरिंग में फंसे थे। लेकिन आज के हालात ऐसे है कि शेयर बाजार की औसतन हर तीन में से एक कंपनी की आर्थिक जुगाली पर सीबीआई नजर रखे हुये है। 1150 कंपनियों की बकायदा हवाला और मनीलैंडरिंग की जांच कर रही है। एफडीआई का रास्ता ही मारीशस और मलेशिया वाला है जिसे सरकार ही हवाला रुट मानती है। इन्ही रास्तों से विदेशी निवेश को दिखाने वाली भारतीय कंपनियों ने ही खुद की व्यूह रचना तैयार की है जिससे 50 लाख करोड़ से ज्यादा की पूंजी का ओर-छोर है क्या यह पकड़ पाना मुश्किल ना भी हो लेकिन इसे पकड़ा गया तो मनमोहन इक्नामिक्स का वह ढांचा चरमराने लगेगा जिसपर खड़े होकर भारतीय कंपनियों ने अब दुनिया में इनवेस्ट करना शुरू किया है।

इस दौड़ में देश के टॉप कारपोरेट भी हैं जिन्होंने इस दौर में 47 बिलियन डॉलर बिदेश में निवेश किया जबकि भारत में सिर्फ 22 मिलियन डॉलर। इसलिये बडा सवाल यही से खड़ा होता है कि जब आर्थिक भ्रष्टाचार की जमीन पर ही आर्थिक सुधार चल पडा है तो फिर इसे सरकारी व्यवस्था के ढांचे में कैसे रोका जा सकता है। और इसे रोकने के लिये जो अपराधिक कानून लागू करने से लेकर सजा देने का ढांचा तैयार होगा अगर उसके घेरे में उसमें सरकार, सांसद और प्रधानमंत्री नहीं आये तो फिर संसद के बिकने में कितने दिन लगेगें । और तब यह सवाल जागेगा कि क्या वाकई हम आजाद है और आजादी का जश्न मनाये।

पुण्य प्रसून बाजपेयी
पुण्य प्रसून बाजपेयी ज़ी न्यूज़ में प्राइम टाइम एंकर और सम्पादक हैं। पुण्य प्रसून बाजपेयी के पास प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 20 साल से ज़्यादा का अनुभव है। प्रसून देश के इकलौते ऐसे पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी पत्रकारिता में बेहतरीन कार्य के लिए वर्ष 2005 काइंडियन एक्सप्रेस गोयनका अवार्ड फ़ॉर एक्सिलेंस और प्रिंट मीडिया में बेहतरीन रिपोर्ट के लिए 2007 का रामनाथ गोयनका अवॉर्ड मिला। उनके ब्लॉग http://prasunbajpai.itzmyblog.com/ से साभार

Monday, July 11, 2011

धर्म को उसके लक्षणों से पहचान कर अपनाइये कल्याण के लिए

अक्सर लोग उपदेश भी बेमन से सुनते हैं और क़ानून की पाबंदी भी फ़िज़ूल समझते हैं। इस तरह अनुशासन और संयम से हीन लोगों की भीड़ वुजूद में आ जाती है जो ख़ुद तो अपने हक़ से ज़्यादा पाना चाहते हैं और दूसरों को उनका जायज़ हक़ तक नहीं देना चाहते। इस तरह समस्याएं जन्म लेती हैं और इनका कारण पिछले जन्म के पाप नहीं बल्कि इसी जन्म की अनुशासनहीनता होती है।
इंसान के अंदर डर और लालच, ये दो प्रवृत्तियां होती हैं। ईश्वर में विश्वास और धर्म के पालन से इनमें संतुलन बना रहता है लेकिन ठगों ने ईश्वर के आदेश छिपा कर अपने उपदेश समाज में फैला दिए और इसका नतीजा यह हुआ कि धर्म का लोप हो गया और ईश्वर और धार्मिक परंपराओं के नाम पर लूट और अत्याचार का बाज़ार गर्म हो गया, किसी एक देश में नहीं बल्कि सारी दुनिया में। बुद्धिजीवियों ने यह देखा तो उनका विश्वास धर्म से उठ गया और उन्होंने ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व को ही नकार दिया। अतः पढ़े लिखे लोगों में यह धारणा बन गई कि ईश्वर है ही नहीं तो ईनाम या सज़ा कौन देगा ?
और जब आत्मा ही नहीं है तो फिर ईनाम या सज़ा का मज़ा भोगेगा कौन ?
इसके बाद तार्किक परिणति यही होनी थी कि दुनिया में ज़ुल्म का बाज़ार गर्म हो जाए और यही हुआ भी । पढ़े-लिखे और समझदार (?) अर्थात नास्तिक लोगों का मक़सद केवल प्रकृति पर विजय पाकर ऐश का सामान इकठ्ठा करना ही रह गया।
ईश्वर और धर्म का इन्कार करने वालों ने दुनिया को बर्बाद करके रख दिया और इन लोगों का विश्वास जिन ठगों ने हिलाया है वे मानवता के इससे भी ज़्यादा मुजरिम हैं।
मंदिर या मस्जिद में जाने से ही आदमी धार्मिक नहीं बन जाता। ये धार्मिक कर्मकांड तो रावण और यज़ीद दोनों ही करते थे। आदमी का धर्म उसके आचरण से प्रकट होता है। धर्म के लक्षण हरेक भाषा की किताब में लिखे हुए हैं और वे सत्य, न्याय , उपकार और क्षमा आदि हैं कि अगर इन्हें अपना लिया जाए तो आदमी की मेंटलिटी क्राइम फ़्री हो जाएगी। मानने वाले लोग पहले भी ईश्वर की कृपा पाने के लिए ही उसकी व्यवस्था का पालन करते थे और आज भी करते हैं। संविधान का पालन ख़ुद ब ख़ुद ही हो जाता है।
ये सिक्के आज भी चल रहे हैं। अपनी वासनाओं में डूबे हुए लोगों का अपनी मुसीबत में ईश्वर-अल्लाह को याद करना इसी का प्रमाण है।
इसी बात को आप नीचे दिए गए लिंक पर भी देख सकते हैं :
आदमी का धर्म उसके आचरण से प्रकट होता है
1- http://www.amankapaigham.com/2011/07/blog-post_11.html?showComment=1310397703955#c4491598195124013322

Tuesday, June 21, 2011

पिछले जन्म की ख़बरें देने वाले बच्चों की हक़ीक़त


अख़बारों में और टी. वी. चैनल्स पर आए दिन कुछ ऐसे बच्चे दिखाए जाते हैं जो बताते हैं कि वे पिछले जन्म में अमुक व्यक्ति थे और उनकी मौत ऐसे और ऐसे हुई थी और जब जाकर देखा जाता है तो कुछ बच्चे वाक़ई सच बोल रहे होते हैं। वे उन जगहों पर भी जाते हैं जहां उन्होंने कुछ गाड़ रखा होता है और उनके अलावा कोई और उन जगहों को नहीं जानता। वे खोदते हैं तो वहां सचमुच कुछ चीज़ें भी निकलती हैं। इस तरह के बच्चे भी जैसे जैसे बड़े होते चले जाते हैं। वे भूलते चले जाते हैं कि वे सब बातें जो वे पहले बताया करते थे जबकि वे अपने बचपन की बातें नहीं भूलते।
दरअस्ल उस बच्चे का यहां पनर्जन्म हुआ ही नहीं होता है और जो कुछ वह बता रहा था, उसे भी वह अपनी याददाश्त से नहीं बता रहा था। हक़ीक़त यह है कि हमारे अलावा भी हमारे चारों ओर अशरीरी चेतन आत्माएं मौजूद हैं। इन्हीं में कुछ आत्माएं किसी कमज़ोर मन को अपनी ट्रांस में लेकर बच्चे के मुंह से वही बोल रही होती हैं। जेनेरली इन्हें शैतान की श्रेणी में रख दिया जाता है क्योंकि ये परेशान करती हैं। इनके इलाज के लिए हम बच्चे को अज़ान सुनाते हैं। उसमें मालिक का पाक नाम है और उसकी बड़ाई का चर्चा है। एक बार ऐसा ही केस हमारे एक बुज़ुर्ग दोस्त मौलाना कलीम सिद्दीक़ी साहब के सामने लाया गया। उनके सामने भी वह बच्चा पिछले जन्म की बातें बताने लगा। इसी दरम्यान मौलाना चुपके से अज़ान के अल्फ़ाज़ दोहराए और चुपके से उस बच्चे पर फूंक मारी। यह अज़ान जब उस पर सवार शैतान आत्मा ने सुनी तो वह भाग खड़ी हुई। पिछले जन्म की बातें बताते बताते बच्चा अचानक ही ख़ामोश हो गया।
मौलाना ने बच्चे से पूछा कि हां, बताओ बेटा और क्या हुआ था आपके साथ पिछले जन्म में ?
तो वह चुप हो गया क्योंकि उसके मुख से जो बता रहा था वह तो भाग ही चुका था।
हिन्दू भाईयों के सामने इस तरह की घटनाएं आती हैं तो उन्हें लगता है कि आवागमन की उनकी मान्यता का प्रमाण हैं ये घटनाएं। वे इन्हें अजूबा बना लेते हैं। वे ऐसे बच्चों का रूहानी या मानसिक इलाज कराने के बजाय उन्हें सेलिब्रिटी बना लेते हैं। अख़बार वाले उनका इंटरव्यू छापते हैं और चैनल वाले भी अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए इन मासूम बच्चों का इस्तेमाल करते हैं।
हालांकि इन बच्चों के माता-पिता अज़ान सुनाकर इन्हें स्वस्थ कर सकते हैं और इस भ्रमजाल से अपने बच्चों के साथ ख़ुद को भी मुक्ति दिला सकते हैं।
अगर वे अज़ान न भी सुनाना चाहें वे अपनी भाषा के पवित्र मंत्र पढ़कर आज़मा सकते हैं। मालिक के पाक नाम तो हिंदी-संस्कृत में भी हैं और इन भाषाओं में उस मालिक की महानता का चर्चा भी है।
हरेक बच्चा इस दुनिया में फ़्रेश आता है। यह तर्क से तो साबित है ही, अनुभव से भी साबित हो चुका है।
अगर कोई इलाज न भी कराया जाए तब भी जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है और उसका मन मज़बूत होता जाता है। वह अज्ञात आत्मा की ट्रांस से ख़ुद ही मुक्त होता चला जाता है।
यह बात केवल कुछ बच्चों के लिए ही है। कुछ बच्चों के दावे तो अनुसंधान के बाद केवल माता पिता के सिखाने का परिणाम भी साबित हुए हैं। किसी बड़े आदमी के परिवार से अर्थलाभ की ख़ातिर माता-पिता ने अपने बच्चों को कुछ बातें रटवा दी थीं।
बहरहाल यह दुनिया है। सच्ची बात केवल मालिक जानता है और वही बता भी सकता है कि हक़ीक़त क्या है ?
जो बंदा उसे मानता है, उसकी वाणी को मानता है। वह इन सब छल फ़रेब का शिकार नहीं बनता। वह न किसी आवागमन को मानता है और न ही आवागमन से मुक्ति के प्रयास में जंगल में जाकर बेकार की साधनाएं करता है।
इंसान मुक्त ही पैदा हुआ है। उसे चाहिए कि वह समाज में रहे। अपने कर्तव्यों का पालन करे। अपने इरादे से कोई पाप न करे और अगर कोई हो जाए तो तुरंत उस कर्म को त्याग दे। उसका प्रभु पालनहार उससे केवल यही चाहता है।
इस संबंध में इसी चर्चाशाली मंच की एक पोस्ट और भी उपयोगी है

आवागमन महज़ एक मिथकीय कल्पना है Awagaman



और आप एक नज़र इस पोस्ट पर भी डाल सकते हैं
http://zealzen.blogspot.com/2011/06/blog-post_22.html?showComment=1308721446104#c8240670385752030936
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http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/8910218.cms

Tuesday, June 7, 2011

'साधु और संग्रह' - Shiv Kumar Goyal



शिवकुमार गोयल जी एक लेखक हैं। आज 'अंतर्यात्रा' कॉलम में मैंने उनके एक छोटे से लेख 'साधु और संग्रह' पढ़ा जो कि अमर उजाला दिनाँक 14 मार्च 2011 के अंक में पृष्ठ सं. 12 पर छपा है। उसका एक अंश यहाँ उद्धृत है :
'संसार से वैराग्य होने पर कुछ लोग गृहस्थी त्यागकर साधु -संयासी बन जाते हैं। वे कई बार आधुनिकता की चकाचौंध में फँसकर भगवत भजन और सांसारिक लोगों का मार्गदर्शन करने के बजाए चेले बनाने और भव्य आश्रमों के निर्माण में लग जाते हैं। यह ग़लत है। विरक्त संत उड़िया बाबा कहा करते थे ,'यदि सांसारिक ऐश्वर्य में जीने की लालसा है तो साधु बनने की क्या आवश्यकता थी ? असली साधु-संयासी के लिए तो धर्म ग्रंथों में किसी भी प्रकार के संग्रह वर्जित बताया गया है , तो फिर चेले-चेलियाँ बनाने और आश्रम तैयार करने की आकांक्षा पालना उचित नहीं।'
आज के समय में अब उसे ही बड़ा संत माना जाता है , जिसके आश्रम जहाँ-तहाँ फैले होते हैं। इन कथित संतों के शास्त्र विरुद्ध और मर्यादाहीन जीवन जीने के दुष्परिणाम भी अब सामने आ रहे हैं।' 
इस अहम चर्चा को आप ‘परिचर्चा‘ पर भी देख सकते हैं:

और भाई ख़ुशदीप जी की चर्चा भी एक यादगार चर्चा है। यह चर्चा अपने आप में एक आईना है।

Monday, April 25, 2011

क्या यह संभव है कि भगवान ही न रहे ? God is immortal .


साईं कहते हैं मालिक को और जब सत्य शब्द भी इसके साथ लग जाता है तो यह नाम ईश्वर के लिए विशेष हो जाता है क्योंकि हर चीज़ का सच्चा स्वामी वही एक है जो न तो पैदा होता है और न ही उसे मौत आती है। जन्म-मरण का चक्र उसे बांधता नहीं है।
आज सुबह अख़बार में ख़बर देखी कि सत्य साईं बाबा नहीं रहे।
‘नहीं रहे‘ से क्या मतलब ?
सत्य साईं बाबा खुद को भगवान बताते थे। क्या यह संभव है कि भगवान ही न रहे ?
आदमी की मौत बता देती है कि मरने वाला भगवान और ईश्वर नहीं था लेकिन  जिन लोगों पर अंधश्रृद्धा हावी होती है वे फिर भी नहीं मानते।
मैं इस विषय पर कुछ लिखना चाहता था लेकिन एक लेख पर मेरी नज़र पड़ी तो मैंने मुनासिब समझा कि इसे ज्यों का त्यों आपके सामने पेश कर दूं।

एक मंझोले जादूगर की मौत

भारत के एक मंझोले जादूगर सत्यनारायण राजू उर्फ सत्य साईं बाबा की मौत हो गई। सत्य साईं का प्रभाव 165 देशों में बताया जाता है और इनके ट्रस्ट ने कई क्षेत्रों में जनहित में काम किए हैं। इनके ट्रस्ट की दौलत 40 हजार करोड़ रुपए बताई जाती है।

सत्य साईं बाबा सचमुच में सोने की खान थे। वे कई बार अपने मुंह से सोने की गेंद, चेन और शिवलिंग निकाल चुके थे। इस तरह बाबा स्विस घड़ियों और भभूत की खान भी थे। हालांकि बाबा के ये कारनामे कोई भी औसत जादूगर कर सकता है। मैंने सुना-पढ़ा है कि भारत के महान जादूगर पीसी सरकार ने बाबा के चमत्कारों को साधारण करतब बता कर चुनौती दी थी कि वे साईं उनके सामने अपने चमत्कार दिखाएं और वे खुद वैसे ही जादू दिखाएंगे। हालांकि बाबा ने कभी यह चुनौती स्वीकार नहीं की। अब भला हाथ की सफाई दिखाने वाले जादूगर से एक चमत्कारी बाबा का क्या मुकाबला!


सत्य साईं की मौत पर मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और लाल कृष्ण आडवाणी को बहुत दुख हुआ। सचिन तेंडुलकर को भी। एक न्यूज चैनल दिखा रहा था कि सचिन इस मौत से सदमे में हैं। सचिन ने नाश्ता नहीं किया और होटेल के कमरे में खुद को बंद रखा है और किसी से भी मिलने से इंकार कर दिया। सचिन ने सत्य साईं के खराब स्वास्थ्य के मद्देनजर पहले ही घोषणा की थी कि वह अपना बर्थडे नहीं मनाएंगे। पहले खबर आई थी कि सचिन रविवार का मैच भी नहीं खेलेंगे। मेरे एक दोस्त ने टिप्पणी की कि पिता की मौत के बाद बेहतरीन पारी खेली थी और अब नहीं खेलेंगे! हालांकि बाद में सचिन ने मैच खेला।

सत्य साईं बाबा क्या वाकई नहीं रहे? नहीं, संदेह का कोई मतलब नहीं है लेकिन सत्य साईं ने खुद ही 96 साल की उम्र में शरीर त्यागने की बात कही थी तो बाबा 85 साल की उम्र में ही कैसे चले गए! क्या वह लोगों के कलियुगी व्यवहार से तंग आ गए थे। मतलब ऐसा व्यवहार कि मरने से पहले ही लोग पूछने लगे कि बाबा के मरने के बाद उनकी जायदाद का क्या होगा!

अब इससे भी घोर कलयुग क्या आएगा कि जो बाबा भभूत से पूरी दुनिया का कष्ट दूर करता हो, उसी के इलाज के लिए विदेश से डॉक्टर आएं! हो सकता है कि बाबा की इच्छा ऐसे लोगों के बीच रहने की न रह गई हो या कौन जाने अस्पताल के बिस्तर पर लेटे बाबा ने अपनी भविष्यवाणी में सुधार किया हो लेकिन किसी ने उस पर गौर न किया हो। या क्या जाने बाबा ने 11 साल के लिए समाधि ही ली हो और नादान डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया हो!

खैर सत्य साईं की एक बात मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई। उन्होंने कहा था, ‘मैं भगवान हूं, तुम भी भगवान हो। फर्क सिर्फ इतना है कि यह मुझे पता है और 
तुमको नहीं पता है।’ अफसोस कि बाबा की इस साफगोई को लोग समझ नहीं सके।

 से साभार  

Friday, April 15, 2011

क्या हम अहसान फ़रामोश बनकर नहीं रह गए हैं ? Ungratefulness


आज लोगों ने उन मज़लूमों को भुला दिया है, जिन्होंने अंग्रेज़ी राज में 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग में गोलियां खाई थीं और जिनके बदले आज देशवासी चैन से कमा-खा रहे हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन को लेकर शोर पुकार मचाने वाले मीडिया को भी इसमें कोई कमाई नज़र न आई तो उसने भी इसे नज़रअंदाज़ करना ही मुनासिब समझा। जिन दरोग़ा और सिपाहियों ने जलियावालां बाग़ के बेकुसूरों पर गोलियां चलाई थीं, वे अंग्रेज़ी राज में भी मौज मारते रहे और उन्हें आज़ादी के बाद भी ससम्मान उनके पदों पर बहाल रखा गया। वे पहले भी मस्त रहे और बाद में भी हराम की खाते रहे जबकि आज़ादी के लिए मरने वाले अपनी जान से गए और उनके बाद उनके परिवार अंग्रेज़ों के जुल्मों के शिकार हो गए। शहीद बर्बाद हो गए और अंग्रेज़ों के पिठ्ठू चिलमचियों के दोनों हाथों में लड्डू रहे। मौक़ापरस्त आज भी मौज मार रहा है और उसूलपसंद नुक्सान पे नुक्सान उठा रहा है।
शासक भी मौक़ापरस्त हैं और इस देश की अधिकतर जनता भी इंसानी उसूलों से ग़ाफ़िल है। इनमें से किसी ने भी जलियांवालां बाग़ के मज़लूमों को याद तक न किया। ऐसी जनता अगर दुखी है तो अपने दुख के पीछे वह खुद है। यह जनता चाहती है कि कोई आए और उसके दुख दूर कर दे। 
जनता ऐसा करिश्मा चाहती है जिससे उसकी तक़दीर चमक जाए और उसे कुछ भी न करना पड़े, उसे कोई कुरबानी भी न देनी पड़े। यहां तक कि नशा, दहेज और फ़िजूलख़र्ची तक भी न छोड़नी पड़े। कोई कुरबानी देनी ही पड़े तो वह कुरबानी भी उसकी जगह कोई और आकर दे दे। 
पहले के लोग फिर भी बेहतर थे, दूसरों की भलाई की ख़ातिर वे अपनी जानें कुरबान कर गए लेकिन अब तो लोग अपने पड़ोसी से उसका हाल चाल पूछने में भी अपने समय की बर्बादी मानते हैं, ऐसे में अपनी जान देने कौन आएगा ?
पिछले शहीदों के साथ जो बर्ताव देश के नेता और आम लोग कर रहे हैं, उसे देखकर किसका दिल चाहेगा कि वह अपनी जान कुरबान करके अपने परिवार को तबाह कर दे और वह भी दूसरों के ऐशो आराम की खातिर ?
शहादत के बाद शहीदों के भटकते परिजनों की व्यथा-कथा अख़बारों में जब-तब छपती ही रहती है।
मरने के बाद अगर सभी लोग मिलकर शहीदों को याद कर भी लें तो भी शहीदों को उनकी याद से क्या फ़ायदा मिलने वाला है ?
उन्हें याद करने से उन्हें तो कोई फ़ायदा नहीं होता लेकिन हमें कई फ़ायदे ज़रूर होते हैं। 
हमें यह फ़ायदा होता है कि हम अहसान फ़रामोशी के ऐब में गिरफ़्तार नहीं हो पाते।
बिना किसी लालच के दूसरों की भलाई के लिए कुरबानी देना एक आला किरदार है। ऐसे आला किरदार के लोगों का चर्चा बार-बार आने से समाज में नेकी और आदर्श का चर्चा होता रहता है और लोग जिस चीज़ को बार बार देखते और सुनते हैं, उसे करते भी हैं। इस तरह बुराई के ख़ात्मे के लिए लड़ने वालों का ज़िक्र नए लड़ने वालों को तैयार करता रहता है और जिस समाज में लगातार ऐसे लोग तैयार होते रहें, वह समाज नैतिक रूप से तबाह होने से बचा रहता है।
आप ग़ौर करेंगे तो और भी बहुत से फ़ायदे आपके सामने आ जाएंगे और उन्हें याद न करने का नुक्सान तो आपके सामने है ही।
आज हमारी जो हालत है, उसका ज़िम्मेदार न तो ईश्वर है, न हमारा भाग्य और न ही कोई विदेशी ताक़त बल्कि इसके ज़िम्मेदार सिर्फ़ और सिर्फ़ हम हैं। जिन लोगों ने हमारे लिए कष्ट उठाए और हमारे लिए अपनी जानें दीं हैं और आज भी हमारे लिए हमारे सैनिक सीमा पर रोज़ाना कुरबानियां दे रहे हैं, उन्हें सम्मान देना, उन्हें याद रखना और उनके परिजनों के लिए अपने दिल में आदर-सम्मान का भाव रखना, यह ऐसी आदतें हैं, जिन्हें हमें सामूहिक रूप से अपने अंदर विकसित करनी होंगी ताकि अगर कोई देश और समाज की बेहतरी के लिए कुछ करना चाहे तो उसके दिल में यह ख़याल न आए कि इन नालायक़ों के लिए ख़ामख्वाह कष्ट उठाने से क्या फ़ायदा ? 

Friday, April 8, 2011

कैसे होता है सकारात्मक लेखन के लिए ब्लॉगर्स का हौसला पस्त ? An Alarming Call

मैं इंसानों के बीच लगभग 40 साल गुज़ार चुका हूं और डेढ़ साल ब्लागर्स के साथ भी कबड्डी से लेकर खो खो और शतरंज तक कई तरह के गेम खेल चुका हूं। इस लंबे अर्से के तजर्बे के बाद मैं कह सकता हूं कि आदमी शांति चाहता है लेकिन उसे मज़ा हंगामों में आता है। ब्लॉग जगत में फैले भ्रष्टाचार और पक्षपात को जड़ से उखाड़ फेंकने की मुहिम में मुझे जिन लोगों की ग़लती को चिन्हित करना पड़ा उनमें से एक मशहूर वकील साहब भी हैं। इसी क्रम में दो पोस्ट में महापत्रकार अजय कुमार झा जी का नाम मजबूरन लेना पड़ा। उन्होंने हमें सलाह दी कि
‘वक्त को समझिए डॉण् साहब ए उर्जा को अगर सही दिशा मिले तो ही वो सृजन करती है।‘
उनकी बात बिल्कुल सही थी, सो हमने फ़ौरन उस पर अमल किया और एक सकारात्मक संदेश देने वाली पोस्ट तैयार करके हिंदी ब्लॉग जगत के सुपुर्द कर दी।
अब सुनिए कि हमारी तीनों पोस्ट के साथ हुआ क्या ?
पहली दोनों पोस्ट्स में से तो एक को 27 पाठकों ने देखा और उस पर 8 कमेंट हुए। दूसरी पोस्ट को 35 लोगों ने देखा और उस पर 7 कमेंट हुए।
तीसरी सकारात्मक और सृजनात्मक पोस्ट को कुल 7 पाठकों ने पढ़ा और उस पर कमेंट शून्य है। अजय कुमार झा जी भी उस पर कमेंट देने नहीं आए, जिन्होंने मुझे ऐसा करने की सलाह दी थी। ईमानदारी का दंभ भरने वाले कुछ गुटबंद ब्लॉगर्स, जो कि आए दिन ऐसी ही सलाहें देते घूमते हैं, उनमें से भी कोई इस पोस्ट पर ‘नाइस पोस्ट‘ लिखने नहीं आया।
यह कैसी दुनिया है कि किसी की टांग खींचो तो तुरंत 50 आदमी आ जाएंगे और कमेंट भी देंगे और सलाह भी देंगे कि आप ऐसा करें और आप वैसा करें और जब आप उनकी सलाह के मुताबिक़ सकारात्मक लेखन करेंगे तो फिर न आपको उनमें से कोई पढ़ने आएगा और न ही आपको कमेंट देने के लिए।
सारी हालत आपके सामने है क्योंकि मेरी तीनों पोस्ट आप हमारी वाणी के बोर्ड पर देख सकते हैं। यह बात सकारात्मक लेखन के लिए ब्लॉगर्स का हौसला पस्त करने के लिए काफ़ी है। 
क्या यह सही हो रहा है ?
आज यह विषय एक गंभीर चिंतन और आत्ममंथन मांगता है, जिसे हिंदी और मानवता के हित में ईमानदारी से और जल्दी से जल्दी किया जाना ज़रूरी है।

1- दो ब्लॉग पर एक ही पोस्ट , अजय जी के साहस को हमारा सलाम मय 11 तोप के गोलों के साथ इसलिए कि शायद सोने वाले जाग जाएं भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ Corruption
2- अजय कुमार झा जी ने सचमुच ही चार चांद लगा दिए हमारी वाणी को - Anwer Jamal
3- बोलने से पहले खूब सोच लेने से आदमी बहुत सी बुराईयों से बच जाता है The Word

Thursday, April 7, 2011

अजय कुमार झा जी ने सचमुच ही चार चांद लगा दिए हमारी वाणी को - Anwer Jamal

हमारी वाणी का दावा है कि वह नियम भंग करने वाले का धर्म, लिंग और उसका प्रभाव नहीं देखती। अगर कोई भी ब्लॉगर उसका नियम भंग करता है तो वह तुरंत कार्रवाई करती है। अगर ऐसा है तो शायद इस बार अपने महापत्रकार अजय कुमार झा जी पर हमारी वाणी कोई कार्रवाई कर बैठे।
आज हमने देखा कि हमारी वाणी के बोर्ड पर एक ही आदमी के तीन फ़ोटो नज़र आ रहे हैं। हमने सोचा कि अब तो यहां सलीम ख़ान भी नहीं हैं और हमने भी अपने पर-पुर्ज़े समेट लिए हैं तब आखि़र कौन है यह तो द्विवेदी जी की हमारी वाणी का सौंदर्य नष्ट करने पर तुला हुआ है। ग़ौर से देखा तो पता चला कि यह तो अपने अजय कुमार झा जी हैं। उन्हें देखकर दिल को तसल्ली हुई कि ये तो ब्राह्मण हैं, इनसे तो हमारी वाणी का सौंदर्य नष्ट होने का सवाल ही नहीं है। अगर ये एक पोस्ट और कर देते तो उल्टे चार चांद और लग जाते। हम अभी यह सोच ही रहे थे कि उनकी एक पोस्ट और नाज़िल हो गई और सचमुच ही चार चांद लगा दिए उन्होंने। हमने जाकर पोस्ट पढ़ी तो दो पोस्ट तो बिल्कुल एक ही हैं। उनके शीर्षक में भी ज़्यादा अंतर नहीं किया गया है।
आदमी क़ाबिल हैं। अन्ना जी का मुददा है। सब कुछ सही लेकिन हमारी वाणी का दावा है कि वह नियम भंग करने वाले पर कार्रवाई करती है और वह धर्म, लिंग और ब्लॉगर के रूतबे को नहीं देखती।
देखते हैं कि अब अजय जी के दो ब्लॉग का निलंबन होता है या फिर एक का या फिर उन्हें मात्र चेतावनी ही देकर छोड़ दिया जाएगा ?
अजय जी की चारों पोस्ट्स के लिंक निम्न हैं। आप भी जाएं और अन्ना जी का समर्थन करें।
1- http://jholtanma-biharibabukahin.blogspot.com/2011/04/2.html
2- http://aajkamudda.blogspot.com/2011/04/1.html
3- http://khabarokikhabar.blogspot.com/2011/04/3.html
4- http://ajaykumarjha1973.blogspot.com/2011/04/blog-post_07.html

.जैसे ही हमारी पोस्ट पब्लिश वैसी ही अजय जी ने पलती मरकर पोस्ट ही बदल डाली .
http://jholtanma-biharibabukahin.blogspot.com/2011/04/2.हटमल
इस लिंक पर जो पोस्ट नज़र आ रही है ठीक वही पोस्ट नज़र आ रही थी निम्न लिंक पर
http://aajkamudda.blogspot.com/2011/04/1.html
लेकिन अब इस पर नज़र आ रही है
'जन लोकपाल बिल क्या है ?'
हम तोप के गोले छोड़ते और सलामी देते ही रह गए उनके साहस को और वह मैदान ही छोड़ भागे .
खैर यह तो नेट है मिटने के बावजूद भी पुराना रिकार्ड देखना मुमकिन है .  

दो ब्लॉग पर एक ही पोस्ट , अजय जी के साहस को हमारा सलाम मय 11 तोप के गोलों के साथ इसलिए कि शायद सोने वाले जाग जाएं भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ Corruption

Friday, February 11, 2011

आवागमन महज़ एक मिथकीय कल्पना है Awagaman

क्या मौत के बाद भी जीवन है ?
और अगर है तो कैसे और कहां ?
दुनिया के हरेक इंसान के मन में यह सवाल उठता है और दुनिया के तमाम दार्शनिकों ने इस विषय में तरह तरह की कल्पनाएं भी की हैं। आवागमनीय पुनर्जन्म की कल्पना एक ऐसी ही कल्पना है जिसका आधार दर्शन है न कि ईशवाणी।
इसलाम ऐसी कल्पना को असत्य मानता है। इसलाम के अनुसार इंसान की मौत के बाद उसके शरीर के तत्व प्रकृति के तत्वों में मिल जाते हैं लेकिन उसका ‘नफ़्स‘ अर्थात उसके वुजूद की असल हक़ीक़त, उसकी रूह आलमें बरजख़ में रहती है और वहां अपने अच्छे-बुरे अमल के ऐतबार से राहत और मुसीबत बर्दाश्त करती है। एक वक्त आएगा जब धरती के लोग अपने पापकर्मों की वजह से धरती का संतुलन हर ऐतबार से नष्ट कर देंगे और तब क़ियामत होगी। धरती और धरती पर जो कुछ है सभी कुछ नष्ट हो जाएगा। एक लम्बे अंतराल के बाद वह मालिक फिर से एक नई सृष्टि की रचना करेगा और तब हरेक रूह शरीर के साथ इसी धरती से पुनः उठाई जाएगी। इस रोज़े क़ियामत में अगले-पिछले, नेक-बद, ज़ालिम और मज़लूम सभी लोग मालिक के दरबार में हाज़िर होंगे और तब मालिक खुद इंसाफ़ करेगा। उसकी दया से बहुतों की बख्शिश होगी, बहुतों का उद्धार होगा लेकिन फिर भी ऐसे मुजरिम होंगे जिन्होंने ईश्वरीय विधान की धज्जियां उड़ाई होंगी, वे समझाने के बावजूद भी न माने होंगे, अपनी खुदग़र्ज़ी के लिए उन्होंने इंसानों का खून चूसने और बहाने में कोई कमी हरगिज़ न छोड़ी होगी। इन्हें उम्मीद तक न होगी कि कभी इन्हें अपने जुल्म और ज़्यादती का हिसाब अपने मालिक को भी देना है। ऐसे मुजरिम उस दिन अपने रब की सख्त पकड़ में होंगे। उस पकड़ से उन्हें उस रोज़ न तो कोई ताक़त और दौलत के बल पर छुड़ा पाएगा और न ही कुल-गोत्र और सिफ़ारिश के बल पर। उस दिन इंसाफ़ होगा, ऐसा इंसाफ़ जिसके लिए दुनिया में आज हरेक रूह तरस रही है। जो ईमान वाले बंदे होंगे, उन्हें उनकी नेकी और भलाई के बदले में सदा के लिए अमन-शांति की जगह जन्नत में बसा दिया जाएगा और दुनिया में आग लगाने वाले संगदिल ज़ालिमों को सदा के लिए जहन्नम की आग में झोंक दिया जाएगा। न तो आलमे-बरज़ख़ से कोई रूह लौटकर इस ज़मीन पर दोबारा किसी गर्भ से जन्म लेती है और न ही जन्नत या जहन्नम से ही कोई रूह यहां जन्म लेगी।
पाप के लगातार बढ़ने के बावजूद दुनिया की आबादी में रोज़ इज़ाफ़ा ही हो रहा है । जिससे यही पता चलता है कि आवागमनीय पुनर्जन्म महज़ एक दार्शनिक कल्पना है न कि कोई हक़ीक़त। अगर वास्तव में ही आत्माएं पाप करने के बाद पशु-पक्षी और पेड़-पौधों की योनियों में चली जाया करतीं तो जैसे जैसे पाप की वृद्धि होती, तैसे तैसे इंसानी आबादी घटती चली जाती और निम्न योनि के प्राणियों की तादाद में इज़ाफ़ा होता चला जाता, जबकि हो रहा है इसके बिल्कुल विपरीत। इसी तरह दूसरे कई और तथ्य भी यही प्रमाणित करते हैं।

Tuesday, February 8, 2011

‘नफ़रतों का हो ख़ात्मा , इस्लाम इस हक़ीक़त का ऐलान है‘ Divine unity


फलाहारी बाबा के साथ संतुलित आहारी अनवर जमाल
आपका भाई अनवर जमाल, निज़ामुद्दीन दिल्ली में
डाक्टर असलम क़ासमी


Dr. Ziauddin Ahmad, Assistant Director (Unani Medicine),
Ministry of health and family welfare , govt . of इंडिया &
Mr . R . S. Adil Advocate (Left)
मानव जाति एक है। इस्लाम इस हक़ीक़त का ऐलान है। इस्लाम के मानने वालों ने खुद कई मत बनाए और एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगाए और कई बार वे इसमें हद से आगे भी निकल गए। इसका नुक्सान उन्हें हुआ और उनके साथ मुल्क और दुनिया की दूसरी क़ौमों को भी हुआ। दूसरी क़ौमों से उन्हें व्यंग्य भी सुनने को मिले और यह स्वाभाविक था। दूसरी क़ौमों के तर्ज़े अमल और उनके सुलूक ने उन्हें अपना जायज़ा लेने पर मजबूर किया और कुछ दूसरे दुखदायी हादसों ने उन्हें बताया कि सबके लिए एकता ही नफ़ाबख्श और बेहतर है।
पिछले दिनों हमारे एक सत्यसेवी मित्र जनाब सुहैल ख़ान साहब का रामपुर (उ.प्र.) से फ़ोन आया और उन्होंने बताया कि कल यानि कि दिनांक 27 जनवरी 2011 को रामपुर में तमाम मुस्लिम मतों के ज़िम्मेदारों ने अपने इख्तेलाफ़ात भुलाकर एक जमाअत गठित की है, जिसका नाम ‘इत्तेहादे मिल्लत‘ रखा गया है। इसके अध्यक्ष बरेलवी समुदाय से हैं जिनका नाम है सज्जादानशीन जनाब फ़रहत जमाली। ये रामपुर की सबसे बड़ी दरगाह हाफ़िज़ शाह जमालुल्लाह साहब के सज्जादे हैं। इसका सचिव जनाब हामिद रज़ा खां साहब को चुना गया है। हामिद साहब सुहैल भाई की तरह ‘वेद-कुरआन‘ के संदेश का प्रचार एक लंबे समय से कर रहे हैं। उनके अलावा बहुत से भाई-बहन ऐसे हैं जो विश्व एकता के लिए काम कर रहे हैं। इन्हीं भाईयों की दुआओं और कोशिशों का नतीजा है कि रामपुर में सभी मुस्लिम फ़िरक़ों के ज़िम्मेदारों ने एकता की ओर क़दम बढ़ाए। मालिक उनसे सेवा का काम ले, केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि हरेक इंसान के लिए।
‘नफ़रतों का ख़ात्मा हो‘ ऐसी ख्वाहिश सिर्फ़ रामपुर वालों की ही नहीं है बल्कि रामपुर से बाहर भी ऐसी ही ख्वाहिश देखी जा सकती है। कल एक ब्लागर प्लस मीटिंग में भी यही देखने में आया। समाज से नफ़रतों का ख़ात्मा हो और लोगों में एक दूसरे के प्रति विश्वास बहाल हो, लोगों का चरित्र और उनकी आदतें बेहतर हो, मुल्क और समाज में अमन क़ायम रहे, लोग उस वचन को पूरा करें जो कि वे नमाज़ में रोज़ाना अपने मालिक से करते हैं और वे कुरआन के बताए उस सीधे रास्ते पर चलें जिसकी दुआ वे खुद नमाज़ में बार-बार करते हैं। इस मक़सद के लिए ‘अंजुमन ए तहफ़फ़ुज़े इस्लामी (रजिस्टर्ड) काफ़ी समय से अपने स्तर पर कोशिश करती आ रही है। इस अंजुमन की बुनियाद दिल्ली में जनाब रफ़ीक़ अहमद साहब, एडवोकेट ने रखी थी। आजकल इसके सद्र जनाब मुहम्मद ज़की साहब हैं। इस तंज़ीम के सभी सदस्य उच्चशिक्षित और समाज के प्रभावशाली लोग हैं। वे देश विदेश के बड़े-बड़े मुस्लिम स्कॉलर्स के प्रोग्राम कराते आये हैं। जनाब ऐजाज़ हैदर आर्य साहब, डिप्टी डायरेक्टर आल इंडिया उर्दू तालीम घर लखनऊ के ज़रिये हमारी कोशिशें उनके इल्म में आईं तो उन्होंने हमसे मिलने की ख्वाहिश ज़ाहिर की। एक्सीडेंट की चोटें तो तक़रीबन ठीक हो चुकी थीं लेकिन मैं थोड़ा सा बीमार था और फिर अगले ही इतवार को जनाब डाक्टर अयाज़ अहमद साहब की शादी में भी दिल्ली जाना था। मैं कुछ कशमकश में था लेकिन मास्टर अनवार अहमद साहब और डाक्टर अयाज़ साहब ने कह दिया कि आपको तो चलना ही पड़ेगा। बहरहाल हम चले और पहुंच गए दिल्ली। सबसे पहले पहुंचने वालों में हम तीन लोग थे मैं खुद, डाक्टर असलम क़ासमी और मास्टर अनवार साहब। थोड़ी ही देर बाद डाक्टर अयाज़ साहब भी कुछ और साथियों के साथ पहुंच गए और इसी दरमियान उनकी अंजुमन के लोग भी आना शुरू हो गए और उनके बुलाए हुए मेहमान भी। हम सभी का एक दूसरे से तआर्रूफ़ हुआ और फिर हरेक ने अपनी अपनी सोच और तजर्बों को भी शेयर किया। इसी बीच नाश्ता भी हुआ, जुहर की नमाज़ भी हुई और फिर लंच भी हुआ।
लंच में कितनी तरह की वेज और नॉनवेज डिशेज़ थीं, उनके न तो नाम ही पता हैं और न ही ठीक से उन्हें गिनना ही संभव है। यही हाल फलों, चटनियों और मिठाईयों का था। जनाब मुहम्मद ज़की साहब ने अपनी तरफ़ से अहतमाम में किसी भी तरह की कोई कमी न छोड़ी थी। इस बीच वे और उनके साहबज़ादे खड़े रहे और इसरार करके खिलाते रहे। खाने की तारीफ़ करते हुए जनाब आर. एस. आदिल साहब ने कहा कि साहब अगली बार का इंतज़ार रहेगा। उनकी इस सीधी और बिल्कुल सही बात पर सभी मुस्कुरा दिए।
जनाब आर. एस. आदिल साहब ने इस्लाम को एक जीवन पद्धति के तौर पर स्वीकार करने के बाद एक संक्षिप्त पुस्तिका भी लिखी है जिसका नाम है ‘डा. अंबेडकर और इस्लाम‘। यह किताब हिंदुस्तान में बहुत मक़बूल हुई और कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ। उनका कहना है कि मैंने डाक्टर अंबेडकर का साहित्य इतना ज़्यादा पढ़ा है कि शायद किसी अंबेडकरवादी ने भी इतना ज़्यादा न पढ़ा हो। आदिल साहब एक एडवोकेट भी हैं। उनके दो जवान बेटे भी उनके साथ आए थे। इस मजलिस में एक और नौजवान इबराहीम दानिश अलसऊद साहब से भी मुलाक़ात हुई जो कि अपने वालिद साहब के साथ जामा मस्जिद दिल्ली से तशरीफ़ लाये थे।
डाक्टर ज़ियाउद्दीन अहमद साहब से भी यहीं मुलाक़ात हुई। ये दिल्ली में एक ऊंचे ओहदे पर काम करते हैं।
दिल चाहता था कि हम दिल्ली में हैं तो कम से कम शाहनवाज़ भाई से तो मुलाक़ात हो ही जाए। उन्हें हमने बुलाया तो मालूम हुआ कि आज उनके छोटे भाई के आफ़िस की ओपनिंग है लेकिन फिर भी वे थोड़ी देर के लिए आए और लंच से पहले ही चले गए। लंच के बाद भी समाज की बेहतरी के लिए कुछ किए जाने को लेकर बातें होती रहीं। जनाब शमीम अहमद साहब और जनाब रफ़ीक़ अहमद एडवोकेट साहब ने बार बार इस बात पर ज़ोर दिया कि मसलक की बुनियाद पर बंटवारे का ख़ात्मा होना चाहिए। जनाब ज़की साहब ने डाक्टर असलम क़ासमी साहब से पूछा कि क्या ज़कात की रक़म को दावती कामों में ख़र्च किया जा सकता है। डाक्टर असलम क़ासमी साहब ने बताया कि ‘मौल्लिफ़तुल कुलूब‘ की एक मद ज़कात के मसरफ़ में शामिल है और यह मद दावत की मद में ही आती है।
जब मसलकी नफ़रतों के ख़ात्मे का ज़िक्र आया तो मैंने जनाब सय्यद मुहम्मद मासूम साहब का भी उड़ता हुआ सा ज़िक्र किया और कहा कि ऐसे लोग आज भी मौजूद हैं और हरेक मसलक में हैं जिनके दिल अपने मसलक के उसूलों की पाबंदी के बावजूद नफ़रत से ख़ाली हैं। ऐसे लोग आज भी ‘अमन का पैग़ाम‘ दे रहे हैं।
कब वक्त गुज़र गया, पता ही नहीं चला और जब हम घर वापस पहुंचे तो रात के 11 से ज़्यादा बज चुके थे।
इस नशिस्त का ज़िक्र मुकम्मल करने से पहले मैं यह भी बताना चाहूंगा कि हमने दिल्ली में महंत स्वामी रामकृष्ण दास जी से भी मुलाक़ात की। वृंदावन में इन्हें फलाहारी बाबा के नाम से जाना जाता है और परिक्रमा मार्ग पर ‘श्री गोरेदाऊ आश्रम‘ के नाम से इनका आश्रम है। स्थायी रूप से ये ‘श्री बद्रीनारायण मंदिर, शांति आश्रम, जिलतरी घाट, जबलपुर (म.प्र.)‘ में रहते हैं। हमने बाबा जी को ‘वंदे ईश्वरम्‘ पत्रिका के साथ एक पुस्तिका ‘आपकी अमानत आपकी सेवा में‘ भेंट की। जिसे देखकर उन्होंने बहुत सराहा। उनके साथ हमारी मुलाक़ात अच्छी रही। उनसे मिलकर हम निज़ामुद्दी वेस्ट पहुंचे। जहां यह उम्दा नशिस्त अंजाम पाई और जहां सभी हाज़िरीने मजलिस ने मुल्क और समाज की बेहतरी के लिए नफ़रतों को मिटाने के लिए आपस में एक दूसरे की हर संभव मदद करने का संकल्प लिया। दरअस्ल संकल्प तो ये सभी लोग पहले से ही लिये हुए थे। इस मजलिस में तो उसे मिलकर दोहराया भर था ताकि संकल्प ताज़ा हो जाए।
उन्होंने हमें ‘ग़लतफ़हमियों का निवारण‘ और ‘इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद साहब‘ ये दो किताबें दर्जनों से भी ज़्यादा भेंट कीं। इन दोनों किताबों को आप ‘इस्लाम इन हिन्दी‘ पर देख सकते हैं।

Monday, February 7, 2011

A blogger plus meeting in Delhi


कल दिल्ली में एक ब्लोगर प्लस मीटिंग हुई. जिसमें कुछ अहम् मुद्दों पर बात हुई .
इसके बारे में जानकारी बाद में दी जाएगी पहले आप इन फ़ोटोज़  का लुत्फ़ उठाइए .
इस मीटिंग में जिन लोगों को आप जानते हैं उनमें  एक तो मैं खुद ही हूँ .
डाक्टर असलम क़ासमी, डाक्टर अयाज़ अहमद और शाहनवाज़ भाई भी इस उम्दा मीटिंग में मौजूद थे.
इस मीटिंग में सभी मुस्लिम थे जो कि उच्च शिक्षित भी थे और सभी दिल्ली में ऊंचे ओहदों पर मुल्क के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं .

Sunday, February 6, 2011

MUTUAL UNDERSTANDING BY ABDULLAH TARIQ SAHEB(2)



VIEW TODAY EXCEPTIONAL VIDEO ABOUT
THE RELATIONSHIP OF ANCIENT INDIANS WITH HAJ PILGRIMAGE
YOUR KIND VIEWS ARE SOLICITED.

Thursday, February 3, 2011

'मुल्क में पहले इस्लामी बैंक को हरी झंडी' Islamic banking in India

आज उर्दू दैनिक राष्ट्रीय सहारा में एक खबर (पृष्ठ 3) नज़र पड़ी जिसका शीर्षक है 'मुल्क में पहले इस्लामी बैंक को हरी झंडी'।
फिर मैंने पूरी ख़बर पढ़ी तो पता चला कि केरल हाईकोर्ट ने कल उस अर्ज़ी को ख़ारिज कर दिया जो प्रदेश सरकार के इस्लामी बैंक शुरू करने के ख़िलाफ़ दायर की गई थी । यह अर्ज़ी जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रामण्यम स्वामी व अन्य ने दायर की थी। इस अर्ज़ी को ख़ारिज करने वाली बैंच में हैं चीफ़ जस्टिस जयचलामेश्वर और जस्टिस पी. आर. रामचन्द्र मेनन।
बाधा खड़ी करने वाले भी हिंदू और उसे हटाने वाले भी हिंदू और इस देश में इस्लाम को लाने वाले भी हिंदू और इस्लाम को अपनाने वाले भी हिंदू । हिंदू मज़बूत कर रहे हैं इस्लाम को और इस्लाम मज़बूत करेगा अपनी शरण में आने वाले हिंदुओं को। इस तरह हिंदुस्तान रोज़ ब रोज़ मज़बूत होता चला जाएगा।

देख लीजिए ! इस्लाम को फैलने के लिए न किसी औरंगज़ेब की ज़रूरत है और न ही किसी तलवार की । यह फैलता है अपने कल्याणकारी और सत्य होने की वजह से । वह कौन सा दिल है जिसमें सत्य और कल्याण की इच्छा न हो ?
और मनुष्य की इस इच्छा को इस्लाम के अलावा कोई और व्यवस्था पूरी कर नहीं सकती , यह भी सत्य है ।

Tuesday, February 1, 2011

पंडित जी क्यों तुड़वाना चाहते हैं मूर्ति और मज़ार ? Bad wish

पछुआ पवन (pachhua pawan): To Dr Anwar Jamal On अब बताईये कि आपको मेरी किस बात पर ऐतराज़ है ?
http://www.123muslim.com/islamic-art/259-dargah-sharif-hazrat-pir-haji-ali-shah-bukhari-r.html
श्री पवन कुमार मिश्रा जी से हमारा संवाद चल रहा था। इसी दरमियान वे बोले कि
'हिन्दुस्तान में जितने गंडे ताबीज़ मुसलमानों द्वारा प्रयुक्त किये जाते है जितनी मजारे बनी है उन मजारो की परस्ती में आप भी शामिल होकर गैर इस्लामिक कृत्या करते है अभी आप ग़ालिब के बुत के पास खड़े होके ग़ालिब की स्तुतिगान किया था यह सब कुफ्र है यदि आप बुत परस्त ना हो तो ग़ालिब समेत तमाम औलिया चिश्ती. जितनी भी दरगाहे है सब को कम से कम आप ज़मीदोज करके माने अन्यथा धरम पर कुछ ना लिखने की कसम खाइए या इसलाम से तौबा कीजिये'
हमने उन्हें जवाब दिया कि
ऐ दोस्त ! अलविदा , ॐ शांति
@ मिश्रा जी ! आप मुझे इस देश का कानून तोड़ने के लिए क्यों उकसा रहे हैं ?
ग़ालिब का बुत और मज़ार मेरी प्रॉपर्टी नहीं हैं । उन्हें तोड़ने की बात कहकर आप मुझे क्राइम करने की प्रेरणा दे रहे और फिर भी अपनी मति पर हंसने के बजाए आप मेरी मति पर हंस रहे हैं ?
जहाँ गंभीर वार्तालाप चल रहा हो , वहां आप हंस क्यों रहे हैं ?
आप हंसने के बजाय तर्क दीजिए और बताईये कि मैं तो आपको वैदिक आचार और संस्कार के पालन की , देश के क़ानून के पालन की शिक्षा दे रहा हूं और उसका जवाब हाँ में देने के बजाय आप मुझे मूर्तियां और मज़ार तोड़कर जुर्म करने की दुष्प्रेरणा दे रहे हैं?
और जब मैं ऐसा जुर्म करने के लिए तैयार नहीं हूँ तो आप मुझे कंस कह रहे हैं ?
भाई मैंने कंस की तरह कब किसी का राज्य क़ब्ज़ाया या कब किसी की लड़कियां मारीं ?
आपने मुझे दुर्योधन कहा , दुर्योधन फिर भी ग़नीमत था पांडवों की अपेक्षा। पांडवो से एक लाख दरजे अच्छे तो आप ही हैं ।
जब आदमी तर्क देने के बजाय हंसने लगे और बुरे लोगों से उपाधियां देने लगे तो समझिए कि उसके पास अपने पक्ष को सत्य सिद्ध करने के लिए कोई भी तर्क मौजूद नहीं है ।
मेरी ताक़त मेरे विरोधियों का विरोध है। आपने मेरा विरोध किया , आपने मुझे मज़बूत किया। आप मुझे पढ़ते हैं तो भी आप मुझे मज़बूत ही करते हैं । आप मुझे पढ़ना बंद कर दीजिए मेरी ताक़त घटती चली जाएगी । आज आप यह प्रण कीजिए कि मेरा कोई भी ब्लाग आप हरगिज़ नहीं पढ़ेंगे।
अब आप आराम से अकेले हंसते रहिए , हम यहां से रूख़्सत होते हैं बिना हंसे ।
मालिक आपको और हमें सन्मार्ग दिखाए ।
आप भी विचार कीजिए कि अगर हरेक आदमी अपने धर्म का पूरी तरह पालन करे और देश के क़ानून को न तोड़े तो हमारे देश में कितनी शांति और खुशहाली आ जाएगी ?
लेकिन अफ़सोसे कि लोग इतनी सही बात को भी केवल इसलिए नहीं मानना चाहते कि इसे मानने के लिए उन्हें कष्ट उठाना पड़ेगा, अपने आप को बदलना पड़ेगा। ज़्यादातर आदमी जैसे हैं, उसी हाल में रहना चाहते हैं और चाहते हैं कि लोग उन्हें उसी हालत में बहुत बड़ा धार्मिक और देशप्रेमी मान लें।
क्या यह रवैया सही है ?


'मूर्ति और मज़ार',Bad wish'

Saturday, January 29, 2011

बहरहाल आज का दिन एक यादगार दिन है और जो कोई मुझसे कुछ सीखना चाहे, सीख सकता है The inspiration

मेरे प्यारे दोस्तो और विरोधियो ! आज का दिन ‘हमारी वाणी‘ के इतिहास में एक यादगार दिन है। आज का दिन हिंदी ब्लागर्स के लिए भी एक प्रेरणा देने वाला दिन है। आज के दिन आपके भाई अनवर जमाल की 7 पोस्ट्स ‘हमारी वाणी‘ के हॉट बोर्ड पर दिखाई जा रही हैं। इनमें से एक पोस्ट एक समाचार पत्र में भी छप चुकी है जिसका तज़्करा ‘ब्लाग्स इन मीडिया‘ नामक वेबसाइट में भी किया गया और उसे भी ‘हमारी वाणी‘ ने अपने बोर्ड पर जगह दी है। इसके अलावा जनाब डा. पवन कुमार मिश्रा जी ने एक पूरी पोस्ट भी मुझे संबोधित करके ही लिखी है और भाई लोगों में उसे पढ़ने की इतनी ज़्यादा होड़ मची कि ‘हमारी वाणी‘ पर उसके पब्लिश होते ही वह चंद ही मिनटों में हॉट का रूतबा पा गई। लखनऊ ब्लागर्स एसोसिएशन पर भी हमारे सरसों के फूल देखने के लिए बड़े-बड़े ब्लागर्स आए और वंदना जी भी आईं। जिनकी समझ में वह पोस्ट आई, उन्होंने तो उसे सराहा लेकिन जिनकी समझ में वह न आई वे वहां चक्कर खाते देखे गए। कोई तो समझाने से मान गया और कोई समझाने से भी न माना कि यह पोस्ट अपने अंदर उनकी समझदानी के तंग दायरे से अधिक विस्तार रखती है।
एक दो साहब ने हमें समझाया कि देखो कविता में यह होता है और कविता में वह होता है।
अरे हम कहते हैं कि अभी तुमने शायरी और कविता देखी ही कहां है ?
जिस दिन तुम कविता और शायरी की आत्मा को देख लोगे तो वह तुम्हारी बुद्धि से ठीक ऐसे ही परे होगी जैसे कि खुद तुम्हारी आत्मा तुम्हारी बुद्धि के परे है।
डा. श्याम गुप्ता जी हस्बे आदत अपने ऐतराज़ात से बाज़ नहीं आ रहे हैं। उन्हें समझाया तो कहते हैं कि
‘हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन‘
हम कहते हैं कि जिसे खुद अपनी हक़ीक़त ही मालूम न हो, उसे जन्नत की हक़ीक़त क्या मालूम होगी ?
जिसे उर्दू का ही पता न हो तो उसे उर्दू की शायरी का इल्म क्या होगा ?
उर्दू के ज्ञान का हरेक दावेदार आज अपने ज्ञान को और शायरी की समझ को आज़मा सकता है।
इसके लिए आप देखिए मेरे ब्लाग ‘मन की दुनिया पर मेरी एक ख़ास पेशकश।

बहरहाल आज का दिन एक यादगार दिन है और जो कोई मुझसे कुछ सीखना चाहे, सीख सकता है और जो कोई प्रेरणा लेना चाहे वह प्रेरणा ले सकता है।

Friday, January 28, 2011

दारूल उलूम देवबंद में चल रहे संघर्ष का विश्लेषण The fact

http://hamarianjuman.blogspot.com/2009/09/blog-post_3696.html
हिंदी दैनिक हिंदुस्तान के संपादकीय में आज दारूल उलूम देवबंद में चल रहे संघर्ष का विश्लेषण किया गया है। संपादक महोदय की संवेदनाओं को मोहतमिम मौलाना गुलाम मुहम्मद वस्तानवी साहब के साथ देखकर अच्छा लगा। उन्होंने उनके व्यक्तित्व की भी तारीफ़ की और उनकी उन घोषणाओं की भी जिनमें उन्होंने कहा है कि वे मदरसे के पाठ्यक्रम में विज्ञान, इंजीनियरी और चिकित्सा आदि भी शामिल करेंगे। इन घोषणाओं को संपादक महोदय ने उदारवादी और सुधारवादी क़रार दिया जो कि वास्तव में हैं भी और मौलाना वस्तानवी का विरोध करने वालों को उन्होंने पुरातनपंथी और कट्टरवादी क़रार दे दिया और निष्कर्ष यह निकाला कि दारूल उलूम देवबंद में जो संघर्ष फ़िलहाल चल रहा है वह वास्तव में पुरातनपंथियों और सुधारवादियों के बीच चल रहा है।
यह निष्कर्ष सरासर ग़लत है। जो लोग मौलाना वस्तानवी का विरोध कर रहे हैं वे पुरातनपंथी और कट्टर (बुरे अर्थों में) हरगिज़ नहीं हैं। उन्होंने भी दारूल उलूम देवबंद के पाठ्यक्रम में कम्प्यूटर और हिंदी व गणित आदि विषय शामिल किए हैं और हिंदी की भी वही किताब वहां पढ़ाई जाती है जो कि बाज़ार में सामान्य रूप से उपलब्ध है, जिसमें कि राम, सीता और हनुमान की कहानियां लिखी हुई हैं। अगर वे सामान्य अर्थों में कट्टर और पुरातनपंथी होते तो वे ऐसा हरगिज़ न करते या कम से कम वे हिंदी की ऐसी किताब तो चुन ही सकते थे जिसमें कि रामायण की कहानी के बजाय मुसलमान बुजुर्गों के क़िस्से होते। किसी चीज़ को देखे बिना महज़ लिखित सूचनाओं के आधार पर जब निष्कर्ष निकाला जाता है तो वे निष्कर्ष इसी तरह ग़लत होते हैं जैसे कि आज के संपादकीय में निकाला गया है।
जो लोग देवबंद में रहते हैं वे जानते हैं कि देवबंद का एक आलिम घराना संघर्ष का इतिहास रखता है। वह दूसरों से भी लड़ता है और खुद अपनों से भी। उसकी लड़ाई का मक़सद कभी मुसलमानों का व्यापक हित नहीं होता बल्कि यह होता है कि ताक़त की इस कुर्सी पर वह नहीं बल्कि मैं बैठूंगा। वर्तमान संघर्ष के पीछे भी असली वजह कट्टरता और पुरानी सोच नहीं है बल्कि अपनी ताक़त और अपने रूतबे को बनाए रखने की चाहत है। यह संघर्ष पुरातनपंथी सोच और उदारवादी सोच के बीच नहीं है बल्कि दरअस्ल यह संघर्ष दो ऐसे लोगों के दरम्यान है जिनमें से एक आदमी मौलाना वस्तानवी हैं जो मुसलमानों और देशवासियों के व्यापक हितों के लिए सोचते हैं और दूसरा आदमी महज़ अपने कुनबे के हितों के लिए। यह संघर्ष परोपकारी धार्मिक सोच और खुदग़र्ज़ परिवारवादी सोच के दरम्यान है। परिवारवादी खुदग़र्ज़ो के साथ भी वही लोग हैं जो कि उन्हीं जैसे हैं, जिनके लिए इस्लाम और इंसाफ़ के बजाय अपने निजी हित ज़्यादा अहम हैं। ये लोग अक्सर इस्लाम के नाम पर पहले अपने पीछे मुसलमानों की भीड़ इकठ्ठी करते हैं और फिर सियासत के धंधेबाज़ों से उन्हें दिखाकर क़ीमत वसूल करके अपने घर को महल में तब्दील करते रहते हैं और बेचारे मुसलमानों का कोई एक भी मसला ये कभी हल नहीं करते। मुसलमान सोचता है कि ये रहबरी कर रहे हैं जबकि ये रहज़नी कर रहे होते हैं। मुसलमानों की दशा में लगातार बिगाड़ आते चले जाने के असल ज़िम्मेदार यही ग़ैर-ज़िम्मेदार खुदग़र्ज़ हैं। धर्म की आड़ में ये लोग अर्से से जो धंधेबाज़ी करते आए हैं, मौलाना वस्तानवी के आने से उसे ज़बरदस्त ख़तरा पैदा हो गया है। उनका वजूद ही ख़तरे में पड़ गया है। यही वजह है कि वे मौलाना वस्तानवी का विरोध कर रहे हैं और इसके लिए छात्रों को अपना मोहरा बना रहे हैं। वे नहीं चाहते कि दारूल उलूम देवबंद में कोई ऐसा ढर्रा चल पड़े जिसकी वजह से मदरसे के छात्रों  और आम मुसलमानों में दोस्त-दुश्मन और रहबर और रहज़न की तमीज़ पैदा हो जाए और उनके लिए अपनी ग़र्ज़ के लिए उनका इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाए।
यही असल वजह है दारूल उलूम देवबंद में जारी मौजूदा संघर्ष की। इस संघर्ष को इसी नज़रिए से देखा जाना चाहिए और उम्मीद करनी चाहिए कि मौलाना वस्तानवी इसमें विजयी रहेंगे क्योंकि एक तो वजह यह है कि उम्मीद हमेशा अच्छी ही रखनी चाहिए और दूसरी बात यह है कि गुजरात के मुसलमान आर्थिक रूप से बहुत मज़बूत हैं और वे आर्थिक रूप से दारूल उलूम देवबंद की बहुत इमदाद करते हैं। उन्हें नज़रअंदाज़ करना या उनके साथ धौंसबाज़ी करना आसान नहीं है, ख़ासकर तब जबकि वे अपने विरोधी की नीयत को भी पहचान चुके हों कि उनके विरोधी की नीयत इस्लाम का हित नहीं है बल्कि खुद अपना निजी हित है। देवबंद की जनता और मीडिया के समर्थन ने भी मौलाना वस्तानवी के विरोधियों की हिम्मत को पस्त करना शुरू कर दिया है। दारूल उलूम देवबंद में बेहतर तब्दीली के लिए मीडिया एक बेहतर रोल अदा कर सकता है और उसे करना भी चाहिए क्योंकि मुसलमानों के साथ साथ अन्य देशवासियों के हित में भी यही है।

Thursday, January 27, 2011

आप मुझे सवाल दीजिए मैं आपको जवाब दूंगा The purification of human heart

मेरे अज़ीज़ भाई हरीश जी ! आज हरेक आदमी एक नक़ाब लगाकर समाज में घूम रहा है। उसके अवचेतन में बहुत कुछ दबा हुआ रहता है और उसका चेतन मन उसके मन की भीतरी पर्त से बहुत सी ऐसी चीज़ों को प्रकट होने से रोकता रहता है जिन्हें ज़ाहिर करने से उसे नुक्सान पहुंचने का डर होता है। समाज में दूसरे समुदायों के साथ मुसलमान भी रहते हैं। आप उनसे मिलते हैं, यह आपकी मजबूरी है। इसके बावजूद सच यह है कि आपके अवचेतन मन की गहराईयों में यह बैठा हुआ है कि अधिकतर मुसलमान बुरे हैं। आपने यह बात ‘डंके की चोट पर‘ कही है। यह बात इतनी ज़्यादा ग़लत और असामाजिक है कि आपके ऐसा कहते ही ‘हमारी वाणी‘ ने क़ानूनी डर से तुरंत अपने बोर्ड से आपकी पोस्ट को ही नहीं हटाया बल्कि आपके ब्लाग का पंजीकरण भी रद्द कर दिया। आप कहने को तो कह गए लेकिन जैसे ही आपका क्रोध शांत हुआ और आपका चेतन मन पुनः सक्रिय हुआ तो उसने आपको बताया कि आप ग़लती कर गए हैं। ग़लती का अहसास होते ही आपने तुरंत माफ़ी भी मांग ली, यह आपकी अच्छाई है, इसीलिए मैं आपको एक अच्छा आदमी कहता हूं। आपके मनोविश्लेषण में मैंने पाया है कि आपके अंदर बेसिकली अंध सांप्रदायिकता नहीं है बल्कि बचपन से आप जिस माहौल में पले हैं, उसमें आपने मुसलमानों के बारे में बहुत सी नेगेटिव बातें सुनी हैं, वे आपके अवचेतन मन में बैठी हुई हैं। आपका मिलना-जुलना मुसलमानों से हुआ तो आपकी कुछ धारणाएं तो भ्रांत साबित हो गई हैं लेकिन तमाम भ्रांतियां आपकी अभी दूर नहीं हुई हैं क्योंकि अभी तक आपको या तो कोई एक भी मुसलमान ऐसा नहीं मिला जो कि आपकी सारी ग़लफ़हमियां दूर कर देता या फिर आपने ही उनमें से किसी के सामने अपने मन के सवाल इस डर से नहीं रखे कि ये लोग ख़ामख्वाह बुरा मान जाएंगे।

कुरआन पढने का सही तरीक़ा
आप कहते हैं कि आपने हिंदी का कुरआन भी पढ़ा है।
अब मैं आपको बताता हूं कि आपने कुरआन कैसे पढ़ा है ?
आप एक मीडियाकर्मी हैं। आए दिन आपके सामने कुरआन की आलोचना से संबंधित बातें गुज़रती रहती हैं। ख़ास तौर से आपके हाथ वह पर्चा लगा जिसमें इंसानियत के दुश्मनों ने कुरआन के बारे में यह अफ़वाह फैला रखी है कि कुरआन हिंदुओं को काफ़िर घोषित करता है, मुसलमानों को हिंदुओं से दोस्ती से रोकता है और कहता है उन्हें जहां पाओ वहीं क़त्ल कर डालो।
आपको यक़ीन नहीं आया कि कोई भी धर्मग्रंथ ऐसी घिनौनी तालीम कैसे दे सकता है ?
आपने कुरआन हासिल किया।
यह तो आपने अच्छा किया लेकिन आपने उसके साथ सबसे ग़लत यह किया कि आपको उसे सिलसिलेवार पूरी तरह पढ़ना चाहिए था और उसके साथ आपको पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब की जीवनी भी पढ़नी चाहिए थी कि उन्होंने कुरआन के हुक्म का पालन खुद कैसे किया और अपने अनुयायियों से अपने जीवन में कैसे कराया ?
आपने ऐसा नहीं किया बल्कि आपने केवल उन पर्चों में छपे हुए आधे-अधूरे उद्धरणों को कुरआन से मिलाया और कुरआन को उठाकर अलमारी में रख दिया। आपने उसमें जगह-जगह निशान भी लगा दिये। आप समझते हैं कि आपने कुरआन पढ़ लिया लेकिन आप खुद बताईये कि क्या वाक़ई इसे कुरआन पढ़ना कहा जा सकता है ?
यही बेढंगापन आदमी को कुरआन के बारे में बदगुमान करता है।
जो सवाल आज आपके मन की गहराईयों में दफ़्न हैं, उनमें से शायद ही कोई बाक़ी बचेगा अगर आप कुरआन को क्रमबद्ध रूप से थोड़ा-थोड़ा शुरू से आखि़र तक पढ़ें और उसे पैग़म्बर साहब के जीवन की घटनाओं से जोड़कर समझने की कोशिश करें। कुरआन का मात्र अनुवाद ही काफ़ी नहीं है बल्कि आपको कुरआन की आयतों का संदर्भ भी जानना होगा कि कौन सी आयतें किन हालात में अवतरित हुईं और उनका पालन कब और कैसे किया गया ?
मैं अपने साथ भेदभाव की शिकायत करता हूं कि मेरे साथ भेदभाव किया जाता है। आप बताईये कि मेरी पोस्ट एलबीए के अध्यक्ष ने डिलीट कर दी, उन्होंने ऐसा क्यों किया ?
उन्होंने मेरी पोस्ट डिलीट कर दी तो क्या आपने उनकी इस ग़लत हरकत पर कोई ऐतराज़ जताया ?
अध्यक्ष जी ने मेरी ऐसी पोस्ट क्यों डिलीट कर दी जिसमें मैंने किसी भी हिंदू भाई को या उनके किसी महापुरूष को या उनकी किसी भी परंपरा को बुरा नहीं कहा, उनके किसी धर्मग्रंथ को बुरा नहीं कहा ?
जबकि आपकी पोस्ट को उन्होंने डिलीट नहीं किया जिसमें आपने अधिकतर मुसलमानों को बुरा बताया, जिसमें आपने कुरआन पर ऐतराज़ जताया और उसकी भाषा इतनी उत्तेजक है कि उसे हमारी वाणी के मार्गदर्शक मंडल ने अपने बोर्ड के डिस्पले से हटा दिया।
आपकी जिस पोस्ट को हमारी वाणी के मार्गदर्शक मंडल ने भी आपत्तिजनक पाया जिसमें कि पांच में से चार भाई हिंदू हैं, उसे आपके अध्यक्ष जी ने क्यों नहीं हटाया ?
और
मेरी अनापत्तिजनक पोस्ट को क्यों हटा दिया ?
मैंने उसे दोबारा फिर एलबीए पर डाला, अगर वह आपत्तिजनक थी तो उसे दोबारा क्यों नहीं हटाया गया ?
मेरे साथ भेदभाव होता रहा और आपने एक बार भी अपनी आपत्ति ज़ाहिर नहीं की। यह है आपका भेदभाव। आपने ही नहीं बल्कि कार्यकारिणी के किसी भी हिंदू भाई ने इस जुल्म के खिलाफ़ आवाज़ नहीं उठाई, क्यों ?
जबकि श्री पवन कुमार मिश्रा जी ने इस डिक्टेटरशिप के प्रति अपना रोष प्रकट किया। क्योंकि उन्होंने इस मामले को न्याय की दृष्टि से देखा। उनका नाम आज तक मेरे कट्टर विरोधियों में ही लिया जाता है। इसके बावजूद उन्होंने वह बात कही जो आप नहीं कह पाए, क्यों ?
जो अनवर जमाल के साथ किया जा रहा है वह हरीश सिंह के साथ नहीं किया जाता , दोनों में ऐसा क्या फ़र्क़ है ?
सिवाय इसके कि अनवर जमाल एक मुसलमान है और हरीश सिंह एक हिन्दू.
और अगर मैं इस बात को बार बार आपके सामने लाता हूँ तो आप कहते हैं कि मेरे ऐसा करने से  आपका दिल दुखी होता है .
सच सुनने से आपका दिल दुखी क्यों होता है?
आप अपने भेदभाव को त्याग दीजिये फिर मैं आपसे आपकी शिकायत नहीं करूँगा और तब आपका दिल भी दुखी नहीं होगा .
अपने दिल को दुःख से बचाना खुद आपके हाथ में है क्योंकि हमारे ऋषियों ने बताया है कि अपने दुखों के पीछे कारण है खुद उसी मनुष्य के पाप जो कि दुखी है .
आप कहते हैं कि आप दुखी हैं तो आप अपने कर्मों का विश्लेषण कीजिये और पापमार्ग छोड़कर प्रायश्चित कीजिये.
आपका दुःख निर्मूल हो जायेगा , मेरी गारंटी है .
आप व्यस्त थे, मैं मान लेता हूं लेकिन हमारे अध्यक्ष जी तो यहां एलबीए की कई पोस्ट्स पर गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं देते घूमते रहे लेकिन मुझे शुभकामनाएं देने नहीं आए, क्यों ?
उनके इस रवैये को दुराग्रहपूर्ण और पक्षपात वाला क्यों न माना जाए ?
जो आदमी सबको समान नज़र से न देख सके वह अध्यक्ष बनने के लायक़ कैसे हो सकता है ?
दूसरों से अपील कर रहे हैं कि कोई काम ऐसा न किया जाए कि दूसरों की भावनाएं आहत हों और खुद हमारी भावनाएं वे आहत कर रहे हैं, क्यों ?
अध्यक्ष वह होता है जिसके पास न्यायदृष्टि हो, सबके लिए प्रेम हो और जो बात वह दूसरों से कहे उसे खुद करके भी दिखाए। ये तीनों ही बातें मुझे तो श्री रवीन्द्र प्रभात जी में नज़र आई नहीं।
ब्लागिंग एक ऐसा मंच है कि यहां आपको हरेक सवाल का सामना करना होगा। या तो सवालों का संतोषजनक उत्तर देना होगा।
जो सवालों से बचना चाहे, वह ब्लागिंग में न आए।
मैं सवालों से बचना नहीं चाहता बल्कि मैं चाहता हूं कि जो सवाल आज तक आप लोगों के मन में दबे पड़े हैं, उन्हें आप मेरे सामने लाईये। इंशा अल्लाह मैं उनका जवाब दूंगा।
आपके हरेक सवाल को मैं अकेला फ़ेस करूंगा और आप सबको जवाब भी दूंगा लेकिन आप सब मिलकर भी मेरे सवालों को न तो फ़ेस कर सकते हैं और न ही उनके जवाब आप दे पाएंगे।
या तो आप एलबीए पर सवाल जवाब चलने दीजिए या फिर उन्हें बंद करना चाहें तो जो भी नियम बनाएं उसे सब पर लागू कीजिए।
मेरे ब्लाग चर्चाशाली मंच पर आईये, यहां आप पर कोई पाबंदी नहीं है। आईये आपके अवचेतन में दबी पड़ी हरेक ग्रंथी से मैं आपको मुक्ति दूंगा।
आप मुझे सवाल दीजिए मैं आपको जवाब दूंगा।

Wednesday, January 26, 2011

दारूल उलूम देवबंद में हंगामा मुसलमानों के भविष्य से खिलवाड़ है The tragedy of muslim ummah

http://www.twocircles.net/2011jan19/deoband_rector_maulana_ghulam_vastanvi_talks_tcn_gujarat.html
किसी भी संस्था या समुदाय की बड़ी हस्ती के निधन के बाद नेतृत्व को लेकर कशमकश शुरू हो जाती है। वही कममकश आजकल देवबंद में भी चल रही है। मौलाना गुलाम मुहम्मद वस्तानवी साहब को मजलिसे शूरा ने आपसी मंत्रणा के बाद दारूल उलूम देवबंद का मोहतमिम नियुक्त कर दिया। वे एक अच्छी शख्सियत के मालिक हैं और समाज सेवा का एक अच्छा इतिहास भी रखते हैं। वे एमबीए भी हैं और मुल्क भर में बहुत शिक्षण संस्थाएं उनकी देखरेख में चल रही हैं। उनके आने से उन लोगों के हितों पर चोट पड़ी है जो अपने पीछे भीड़ दिखाकर आज तक कांग्रेस को लुभाते आए हैं। उनके इशारे पर दारूल उलूम के छात्रों ने जमकर हंगामा काटा और इस्लाम को शर्मसार किया। इस्लाम का अर्थ है शांति। इन लोगों शांति भंग की। इस्लाम इल्म हासिल करने को फ़र्ज़ ठहराता है, एक अज़ीम इबादत बताता है, इंसान की पैदाइश का मक़सद बताता है, उसकी असल मंज़िल तक पहुंचने का ज़रिया बताता है। इन लोगों ने क्लासेज़ बंद कराईं, एक बहुत बड़ा गुनाह किया। इस दीनी यूनिवर्सिटी के चंद छात्रों ने अपने आक़ाओं के इशारे पर वह सबकुछ किया जिसे करने से कुरआन रोकता है, हदीसें रोकती हैं। मुसलमान सूफ़ी रोकते हैं, मुल्क का क़ानून रोकता है, सभ्य समाज रोकता है। लेकिन जो दुनियावी इज़्ज़त और सियासी रूतबे के लिए ही जीते हैं वे कब किसी के रोकने की परवाह करते हैं ?
आदमी की पहचान कभी आम हालत में नहीं होती बल्कि उसकी पहचाान तब होती है जबकि कोई कुरबानी देने का मौक़ा आता है। इस्लाम सरासर कुर्बानी है और जो कुर्बानी देने के लिए तैयार नहीं है, वह मुसलमान भी नहीं है। नगरपालिका की लिस्ट खुदा के दरबार में काम न देगी। मुस्लिम वह है जिसे खुदा मुस्लिम क़रार दे न कि वह जिसे सियासी पार्टियां या दुनिया के लोग मुस्लिम कहें।
जो मुस्लिम ही नहीं हैं हक़ीक़त के ऐतबार से, जो धड़ेबंद और गुटबाज़ हैं, जो अल्लाह की हदों को तोड़ने वाले हैं वे आज मुसलमानों के आक़ा बने हुए हैं। मुसलमानों की कमर पर एक अनचाहे बोझ की तरह लदे हुए हैं। मुसलमानों के मौक़ापरस्त सियासी नेताओं से ज़्यादा ख़तरनाक हैं ये लोग, जो एक महान दीनी संस्था में बेवजह ऊधम मचा रहे हैं।
मौलाना गुलाम मुहम्मद वस्तानवी साहब द्वारा मोदी की तारीफ़ करना मात्र एक बहाना है। और फिर अगर मोदी द्वारा गुजरात के विकास के लिए कुछ अच्छा किया जा रहा है तो इस्लाम कब कहता है कि आप अपने दुश्मन के अच्छे कामों की भी तारीफ़ न करें ?
ऐसा करना तो तास्सुब और सांप्रदायिकता है। मोदी ने अगर पूर्व में कुछ ग़लत किया है तो उसे ग़लत कहा गया है और अगर वे आज कुछ अच्छा कर रहे हैं तो उसे अच्छा ही कहा जाएगा। ग़लत का विरोध किया जाएगा और अच्छे काम में साथ दिया जाएगा। इस्लाम की छवि और क़ौम के भविष्य से खेलने वाले ये शरारती तत्व एक-दो हैं लेकिन बहुत ताक़तवर हैं। इनकी दाढ़ी, टोपी और तक़रीरें लोगों को भ्रम में डाल देती हैं कि ये बहुत दीनदार हैं लेकिन अस्ल में दीनदार वह है जो शांति पसंद है क्योंकि इस्लाम का अर्थ ही शांति है। वास्तव में दीनदार वह है जो कुर्बानी देकर सामूहिक फ़ैसले का सम्मान करे जैसे कि हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने हज़रत अबूबक्र को ख़लीफ़ा तस्लीम करके किया था। सहाबा का आला नमूना सामने होने के बावजूद भी ऊधम वही काट सकता है जो कि उनके तरीक़े पर न हो और जो उनके तरीक़े पर न हो वह राह से हट चुका है, उसे कभी मंज़िल मिलने वाली नहीं है।
देवबंद की इसी संस्था में पहले भी सन् 1980 ई. में मोहतमिम पद के लिए रस्साकशी हो चुकी है जिसने उम्मत को सिर्फ़ और सिर्फ़ नुक्सान ही पहुंचाया है। जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो फिर उस खेत की हिफ़ाज़त कौन करेगा ?
ये लोग कहते हैं कि मुसलमानों को मोदी से ख़तरा है। जबकि ख़तरा ये खुद हैं। मीडिया लोकतंत्र का चैथा खंभा कहलाता है लेकिन आप देवबंद के उर्दू पत्रकारों को देख लीजिए। दो बड़े उर्दू समाचार पत्रों में मौलाना वस्तानवी के नज़रिये को कोई जगह ही नहीं दी जा रही है। पत्रकार भी ज़मीरफ़रोशी पर आमादा हैं। फिर किस बुनियाद पर ये उर्दू मीडिया देशी-विदेशी मीडिया पर आरोप लगाती है कि वे अपने मफ़ाद के लिए वाक़ये की सही तस्वीर पेश नहीं करती।
एक अफ़सोस के सिवा हम कुछ नहीं कर सकते लेकिन बहरहाल सच ज़रूर कह सकते हैं और दुआ कर सकते हैं। अल्लाह ने हम पर लाज़िम भी यही किया है।

Tuesday, January 25, 2011

अपने आप को क़ायदे क़ानून का पाबन्द बनाईये 26th january

 26 जनवरी पर एक ख़ास अपील
कुदरत क़ानून की पाबंद है लेकिन इंसान क़ानून की पाबंदी को अपने लिए लाज़िम नहीं मानता। इंसान जिस चीज़ के बारे में अच्छी तरह जानता है कि वे चीज़ें उसे नुक्सान देंगी। वह उन्हें तब भी इस्तेमाल करता है। गुटखा, तंबाकू और शराब जैसी चीज़ों की गिनती ऐसी ही चीज़ों में होती है। दहेज लेने देने और ब्याज लेने देने को भी इंसान नुक्सानदेह मानता है लेकिन इन जैसी घृणित परंपराओं में भी कोई कमी नहीं आ रही है बल्कि ये रोज़ ब रोज़ बढ़ती ही जा रही हैं। हम अपनी सेहत और अपने समाज के प्रति किसी उसूल को सामूहिक रूप से नहीं अपना पाए हैं। यही ग़ैर ज़िम्मेदारी हमारी क़ानून और प्रशासन व्यवस्था को लेकर है। आये दिन हड़ताल करना, रोड जाम करना, जुलूस निकालना, भड़काऊ भाषण देकर समाज की शांति भंग कर देना और मौक़े पर हालात का जायज़ा लेने गए प्रशासनिक अधिकारियों से दुव्र्यवहार करना ऐसे काम हैं जो मुल्क के क़ानून के खि़लाफ़ भी हैं और इनसे आम आदमी बेहद परेशान हो जाता है और कई बार इनमें बेकसूरों की जान तक चली जाती है।
इस देश में क़ानून को क़ायम करने की ज़िम्मेदारी केवल सरकारी अफ़सरों की ही नहीं है बल्कि आम आदमी की भी है, हरेक नागरिक की है। 26 जनवरी के मौक़े पर इस बार हमें यही सोचना है और खुद को हरेक ऐसे काम से दूर रखना है जो कि मुल्क के क़ानून के खि़लाफ़ हो। मुल्क के हालात बनाने के लिए दूसरों के सुधरने की उम्मीद करने के बजाय आपको खुद के सुधार पर ध्यान देना होगा। इसी तरह अगर हरेक आदमी महज़ केवल एक आदमी को ही, यानि कि खुद अपने आप को ही सुधार ले तो हमारे पूरे मुल्क का सुधार हो जाएगा।

गुस्से को मिटाइये मत बल्कि उस पर क़ाबू पाना सीखिये
समाज में सबके साथ रहना है तो दूसरों की ग़लतियों को नज़रअंदाज़ भी करना पड़ता है और कभी कभी उन्हें ढकना भी पड़ता है। हरेक परिवार अपने सभी सदस्यों को इसी रीति से जोड़ता है। क़स्बे और कॉलोनी के लोग भी इसी उसूल के तहत एक दूसरे से जुड़े रह पाते हैं। ब्लाग जगत भी एक परिवार है और यहां भी इसी उसूल को अपनाया जाना चाहिए।
इस कोशिश के बावजूद कभी कभी मुझे गुस्सा आ जाता है और तब मैं यह सोचता हूं कि आखि़र मुझे गुस्सा आया क्यों ?
हमारे ऋषियों ने जिन पांच महाविकारों को इंसान के लिए सबसे ज़्यादा घातक माना है उनमें से क्रोध भी एक है। हज़रत मुहम्मद साहब स. ने भी उस शख्स को पहलवान बताया है जो कि गुस्से पर क़ाबू पा ले।
इसके बावजूद हम देखते हैं कि कुछ हालात में ऋषियों को भी क्रोध आया है, खुद अंतिम ऋषि हज़रत मुहम्मद साहब स. को भी क्रोधित होते हुए देखा गया है।
हिंदू साहित्य में ऋषियों के चरित्र आज में वैसे शेष नहीं हैं जैसे कि वास्तव में वे पवित्र थे। कल्पना और अतिरंजना का पहलू भी उनमें पाया जाता है लेकिन हदीसों में जहां पैग़म्बर साहब स. के क्रोधित होने का ज़िक्र आया है तो वे तमाम ऐसी घटनाएं हैं जबकि किसी कमज़ोर पर ज़ुल्म किया गया और उसका हक़ अदा करने के बारे में मालिक के हुक्म को भुला दिया गया। उन्होंने अपने लिए कभी क्रोध नहीं किया, खुद पर जुल्म करने वाले दुश्मनों को हमेशा माफ़ किया। अपनी प्यारी बेटी की मौत के ज़िम्मेदारों को भी माफ़ कर दिया। अपने प्यारे चाचा हमज़ा के क़ातिल ‘वहशी‘ को भी माफ़ कर दिया और उनका कलेजा चबाने वाली ‘हिन्दा‘ को भी माफ़ कर और मक्का के उन सभी सरदारों को भी माफ़ कर दिया जिन्होंने उन्हें लगभग ढाई साल के लिए पूरे क़बीले के साथ ‘इब्ने अबी तालिब की घाटी‘ में क़ैद कर दिया था और मक्का के सभी व्यापारियों को उन्हें कपड़ा, भोजन और दवा बेचने पर भी पाबंदी लगा दी थी। ऐसे तमाम जुल्म सहकर भी उन्होंने उनके लिए अपने रब से दुआ की और उन्हें माफ़ कर दिया। इसका मक़सद साफ़ है कि अस्ल उद्देश्य अपना और अपने आस-पास के लोगों का सुधार है। अगर यह मक़सद माफ़ी से हासिल हो तो उन्हें माफ़ किया जाए और अगर उनके जुर्म के प्रति अपना गुस्सा ज़ाहिर करके सुधार की उम्मीद हो तो फिर गुस्सा किया जाए।
जो भी किया जाए उसका अंजाम देख लिया जाए, अपनी नीयत देख ली जाए, संभावित परिस्थितियों का आकलन और पूर्वानुमान कर लिया जाए।
वे आदर्श हैं। उनका अमल एक मिसाल है। उनके अमल को सामने रखकर हम अपने अमल को जांच-परख सकते हैं, उसे सुधार सकते हैं।
मुझे गुस्सा कम आता है लेकिन आता है।
आखि़र आदमी को गुस्सा आता क्यों है ?
हार्वर्ड डिसीज़न लैबोरेट्री की जेनिफ़र लर्नर और उनकी टीम ने गुस्से पर रिसर्च की है। उसके मुताबिक़ हमारे भीतर का गुस्सा कहीं हमें भरोसा दिलाता है कि हम अपने हालात बदल सकते हैं। अपने आने वाले कल को तय सकते हैं। जेनिफ़र का यक़ीन है कि अगर हम अपने गुस्से को सही रास्ता दिखा दें तो ज़िंदगी बदल सकते हैं।
हम अपने गुस्से को लेकर परेशान रहते हैं। अक्सर सोचते हैं कि काश हमें गुस्सा नहीं आता। लेकिन गुस्सा है कि क़ाबू में ही नहीं रहता। गुस्सा आना कोई अनहोनी नहीं है। हमें गुस्सा आता ही तब है, जब ज़िंदगी हमारे मुताबिक़ नहीं चल रही होती। कहीं कोई अधूरापन है, जो हमें भीतर से गुस्सैल बनाता है। दरअस्ल, इसी अधूरेपन को ठीक से समझने की ज़रूरत होती है। अगर हम इसे क़ायदे से समझ लें, तो बात बन जाती है।
जब हमें अधूरेपन का एहसास होता है, तो हम उसे भरने की कोशिश करते हैं। और यही भरने की कोशिश हमें कहीं से कहीं ले जाती है। हम पूरे होकर कहीं नहीं पहुंचते। हम अधूरे होते हैं, तभी कहीं पहुंचने की कसमसाहट होती है। यही कसमसाहट हमें भीतर से गुस्से में भर देती है। उस गुस्से में हम कुछ कर गुज़रने को तैयार हो जाते हैं। हम जमकर अपने पर काम करते हैं। उसे होमवर्क भी कह सकते हैं और धीरे धीरे हम अपनी मंज़िल की ओर बढ़ते चले जाते हैं।
असल में यह गुस्सा एक टॉनिक का काम करता है। हमें भीतर से कुछ करने को झकझोरता है। अगर हमारा गुस्सा हमें कुछ करने को मजबूर करता है, तो वह तो अच्छा है न।
                   (हिन्दुस्तान, 6 जनवरी 2011, पृष्ठ 10)